Home Hindi news DNA Analysis: पर्याप्त कोयले के बावजूद देश में क्यों बढ़ रहा बिजली संकट? ये है बड़ी वजह

DNA Analysis: पर्याप्त कोयले के बावजूद देश में क्यों बढ़ रहा बिजली संकट? ये है बड़ी वजह

DNA Analysis: पर्याप्त कोयले के बावजूद देश में क्यों बढ़ रहा बिजली संकट? ये है बड़ी वजह

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DNA Analysis on Power Crisis: पूरा उत्तर भारत इन दिनों लू यानी हीट वेव की गिरफ्त में है. अप्रैल में ही तापमान 45 डिग्री पार कर गया है. मौसम विभाग ने अगले तीन दिनों के लिए बेहद गर्म दिनों की भविष्यवाणी की है. लोग हैरान हैं क्योंकि अप्रैल माह के लिए ये तापमान सामान्य से 3-4 डिग्री ज्यादा है. 

शुक्रवार को सबसे गर्म रहा बांदा जिला

अगर शुक्रवार के आंकड़ें देखें तो उत्तर प्रदेश का बांदा जिला सबसे गर्म रहा. यहां तापमान 47.4 डिग्री तक पहुंच गया. वहीं राजस्थान के गंगानगर में तापमान 46.4 डिग्री रिकॉर्ड किया गया. महाराष्ट्र के चंद्रपुर में भी सूरज जैसे आग उगल रहा है, वहां भी आज का तापमान  46.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया. दिल्ली में तापमान 46.2 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया. बिहार के गया में तापमान 44.1 डिग्री और झारखंड के डाल्टनगंज में 45.7 डिग्री तक पहुंच गया. मध्य प्रदेश के खजुराहो में 45.4 डिग्री तापमान रहा. हरियाणा के गुरुग्राम में 45.2 डिग्री तापमान रहा. अहमदाबाद में 44.2 डिग्री रिकॉर्ड किया गया.

इतनी गर्मी के बीच अगर बिजली भी चली जाए तो दिक्कत कई गुना बढ़ जाती है. देश के कई हिस्से भीषण गर्मी के बीच घंटों की बिजली कटौती झेल रहे हैं. जैसे राजस्थान में गर्मी बढ़ने के साथ बिजली की मांग 31 प्रतिशत बढ़ गई है. इससे राज्य के शहरी इलाकों में 3 घंटे तक बिजली कटौती करनी पड़ रही है.

राज्यों में बढ़ी बिजली की किल्लत

ये वही राजस्थान हैं. जहां कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार बिजली पर छूट दे रही है. वहां पर जो लोग महीने में 100 यूनिट तक बिजली खर्च करते हैं, उनका 50 यूनिट फ्री हो जाता है. वहीं पंजाब में बिजली की मांग 8 हजार मेगावॉट पहुंच चुकी है, जबकि सप्लाई 5 हजार मेगावॉट है. मांग और आपूर्ति के इसी अंतर की वजह से पंजाब में भी 2 घंटे की बिजली कटौती शुरू हो गई है.

ये वही पंजाब है जहां आम आदमी पार्टी की सरकार के आने के बाद से हर घर को हर महीने 300 यूनिट बिजली मुफ्त दी जा रही है. बिहार का भी बुरा हाल है, वहां शहरों में 2 घंटे तो गांवों में 2-3 घंटे तक बिजली गुल रहती है. वहीं उत्तर प्रदेश के शहरों में भी 2-3 घंटे की बिजली कट रही है. हिमाचल प्रदेश में औद्योगिक इकाइयों में 4-6 घंटे तक बिजली कट रही है. हरियाणा में तो हाल और भी बुरा है. वहां हर रोज 6-8 घंटे तक बिजली काटी जा रही है. ये वही हरियाणा है जहां बीजेपी की मनोहर लाल खट्टर सरकार किसानों को छूट दे रही है. वहां किसान हर यूनिट बिजली के लिए सिर्फ 10 पैसे देते हैं.

देश में क्यों बढ़ रहा बिजली का संकट

अगर 2019 के आंकड़ों को देखा जाए तो भारत में राज्य सरकारों ने बिजली पर जनता को 1 लाख 10 हजार करोड़ रुपए की छूट दी, जिसका तीन चौथाई हिस्सा यानि 82 हजार 793 करोड़ रुपए किसानों को गया. ये बात आप इस आंकड़े से समझ सकते हैं कि भारत का शिक्षा बजट कुल 1 लाख 4 हजार करोड़ रुपये का है. यानि देश के शिक्षा बजट से भी ज्यादा बजट फ्री बिजली का है, जो तमाम राज्य सरकारें वोटबैंक के लिए दे रही हैं.

अब सवाल ये उठ रहा है कि आखिर देश में अचानक बिजली की कमी कैसे हो गई है, गर्मियों में अमूमन बिजली की मांग बढ़ जाती है, लेकिन यहां तो अप्रैल महीने में ही बिजली कटौती की नौबत आ गई है. ये मुद्दा बिजली की कमी से ज्यादा कोयला बिल के भुगतान का है. बिजली कटौती का ये संकट ज्यादातर राज्यों का खुद का खड़ा किया गया संकट है. आंकड़ों को देखें तो वक्त पर बिल न भरने की राज्यों की बुरी आदत का पता चलता है, इस आदत का नुकसान आम आदमी उठा रहा है.

राज्यों ने कोयला कंपनियों को नहीं किया भुगतान

इसी साल 18 अप्रैल तक के केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र ने कोयला कंपनियों को 2 हजार 608 करोड़ रुपए का भुगतान नहीं किया है. दूसरे नंबर पर पश्चिम बंगाल है जो अब तक 1 हजार 509 करोड़ रुपए का बिल दबा कर बैठा हुआ है. तीसरे नंबर पर है, झारखंड जिसके सिर पर कोयला कंपनियों का 1 हजार 18 करोड़ रुपया बकाया है. इसके बाद आता है तमिलनाडु, जिसे कोयला कंपनियों का 823.9 करोड़ रुपया भरना है. 

मध्य प्रदेश सरकार ने भी कोयला कंपनियों के 531.4 करोड़ रुपए का बिल नहीं चुकाया है. वहीं राजस्थान के सिर पर 429.5 करोड़ का बिल है तो आंध्र प्रदेश को 271 करोड़ और उत्तर प्रदेश को 213.8 करोड़ रुपए चुकाने हैं. छत्तीसगढ़ ने भी कोयला कंपनियों के 202.8 करोड़ और कर्नाटक ने 134.6 करोड़ रुपए दबा रखे हैं.

इन 4 पॉइंट्स से समझें समस्या की जड़

कोयला कंपनियां राज्यों के बिजली घरों को कोयला सप्लाई करती हैं और सरकारों को उनका पैसा वक्त रहते चुकाना चाहिए, लेकिन ये आंकड़े बता रहे हैं कि ऐसा हो नहीं रहा है. दिक्कत कैसे बढ़ती इसे आपको चार Points में समझाते हैं.

-गर्मियों में बिजली की डिमांड बढ़ती है तो राज्यों को उसके लिए अतिरिक्त बिजली खरीदने की जरूरत पड़ती है.
-कोयला कंपनियों का बिल भरना उनके एजेंडे में नहीं होता है, इसीलिए वो जितना कोयला मिल रहा है उसी में संतोष कर लेते हैं, यानि उनके बिजली घर बढ़ी डिमांड के हिसाब से अतिरिक्त बिजली बना नहीं पाते.
– राज्यों के पास ग्रिड से अतिरिक्त बिजली खरीदने का विकल्प होता है, वो 12 रुपए प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीद कर बढ़ी हुई मांग की पूर्ति कर सकते हैं
-लेकिन राज्य सरकारें ऐसा नहीं करते और इसके बाद बिजली कटौती का मैप तैयार करती हैं. ये तय किया जाता है कि किन इलाकों में कितने घंटे बिजली काट कर मौजूदा स्टॉक में काम चला लिया जाए.

दिल्ली में बढ़ गई है बिजली कटौती

कहा ये भी जा रहा है कि देश में कोयले की सप्लाई में दिक्कतों की वजह से भी बिजली घर पर्याप्त बिजली नहीं बना पा रहे हैं और संकट पैदा हो रहा है. जल्द ही कोयले की सप्लाई राजनीतिक मुद्दा भी बन जाता है और विपक्ष सरकार पर ही बिजली गिराने लगता है. इस बीच देश के कई इलाकों से विरोध प्रदर्शन की खबरें भी आ रही हैं. लोग नाराज हैं कि अपना बिजली बिल वक्त पर भरने के बाद भी आखिर उन्हें बिजली क्यों नहीं मिल पा रही है. वो क्या जानें कि उनकी राज्य सरकारें कोयला कंपनियों के बिल नहीं भर रही हैं, जिसकी वजह से उनके घर अंधेरे में डूबे हैं.

दिल्ली में भी बिजली का संकट बना हुआ है. दिल्ली सरकार के मुताबिक राजधानी में कोयले का बड़ा संकट है और अगर समय रहते सहायता नहीं की गई तो दिल्ली में मेट्रो और अस्पतालों को 24 घंटे बिजली देनी मुश्किल हो जाएगी.

कोयले की कमी की बात से केंद्र सरकार भी इनकार नहीं कर रही है. केंद्रीय ऊर्जा मंत्री प्रहलाद जोशी के मुताबिक कुछ बिजली घरों में कोयले की किल्लत है लेकिन देश के पास अभी भी अगले 10 दिनों के लिए पर्याप्त स्टॉक मौजूद है. केंद्रीय मंत्री के मुताबिक कोयले की ढुलाई 16 फीसदी बढ़ाई गई है लेकिन उसकी डिमांड भी 20 फीसदी बढ़ गई है.

कोयले की कमी है ये बात केंद्र सरकार भी मान रही है लेकिन क्या वाकई में कोयले की कमी की वजह से बिजली की कमी झेलनी पड़ रही है. केंद्र सरकार का साफ कहना है कि कुछ बिजली घरों में दिक्कतें हैं क्योंकि वहां तक कोयला पहुंचने में वक्त लगता है.

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क्या 4 फीसदी का अंतर बन रहा वजह

केंद्र का दावा है कि इस वक्त देश के पास 2 करोड़ 10 लाख टन कोयले का रिजर्व स्टॉक है. ये अगले दस दिनों तक के लिए पर्याप्त है. इस रिजर्व स्टॉक से कोयला तभी लिया जाता है, जब कोयले की मांग उसकी आपूर्ति से बढ़ जाती है. केंद्र सरकार का कहना है कि कोयले की आपूर्ति जहां 2019-20 में 569 मिलियन टन थी, वहीं इसे 2021-22 में बढ़ाकर 662 मिलिटन टन किया गया है. 

गर्मी के मौसम में कोयले की मांग और सप्लाई में अंतर आता है. इस वजह से उन बिजली घरों में दिक्कतें आती हैं, जहां तक कोयला पहुंचने में वक्त लगता है.  कोयले की ढुलाई ट्रेनों से ही की जाती है. बताया गया है कि कोयले की आपूर्ति 16 फीसदी बढ़ाई गई है लेकिन उसकी डिमांड 20 फीसदी बढ़ गई है. इस चार फीसदी के फर्क की वजह से ही कुछ राज्यों में कोयले की सप्लाई को लेकर दिक्कतें आ रही हैं लेकिन केंद्र का कहना है कि जल्द ही इसे दूर कर लिया जाएगा. 



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