why cucumber cut on janmashtami and How to perform Krishna’s birth with a cucumber। खीरे से कृष्ण का जन्म कैसे कराएं


कान्हा का जन्म- India TV Hindi
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कान्हा का जन्म

आज पूरे देश में कृष्ण जन्माष्टमी की धूम है। इस दिन भक्त श्रीकृष्ण की कृपा पाने के लिए उपवास रखते हैं और उनके बाला रूप लड्डू गोपाल की सेवा करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर, खीरे से कान्हा का जन्म कराने की परंपरा है। ऐसे में खीरे से कान्हा का जन्म क्यों कराया जाता है। चलिए इसके पीछे की वजह जानते हैं। 

जन्म लेने की परंपरा को दिखाती है यह प्रक्रिया

खीरे से भगवान कृष्ण के जन्म को दिखाना एक बेहद धार्मिक और लोकप्रिय परंपरा है। जिस तरह बच्चा जन्म के समय अपनी मां के नाल से जुड़ा होता है, उसी तरह खीरे को डंठल से जोड़कर रखा जाता है। जब तक डंठल खीरे से जुड़ा होता है, तब तक इसे फल नहीं, बल्कि गर्भ समझा जाता है। डंठल को काटकर खीरे को अलग करना, माँ के गर्भ से बच्चे के अलग होने का प्रतीक है। 

साथ ही खीरे का इस्तेमाल एक गहरा संदेश देता है: भगवान को प्रसन्न करने के लिए किसी भी महंगी चीज़ की ज़रूरत नहीं है। आप सच्ची भक्ति और सरलता से ही उन्हें खुश कर सकते हैं।

कैसे पूरी की जाती है यह प्रक्रिया?

खीरे को बीचे से हल्का काटकर उसमें लड्डू गोपाल को रखा जाता है और पीले वस्त्र से उन्हें ढक दिया जाता है। रात 12 बजे डंठल को काटकर खीरे से अलग किया जाता है और फिर पीला वस्त्र हटाकर खीरे में से लड्डू गोपाल को निकाला जाता है। और फिर चरणामृत से उन्हें स्नान कराया जाता है। उसके बाद झूले के आसान पर उन्हें बिठाया जाता है। इस तरह, खीरे से कान्हा का जन्म कराना सिर्फ़ एक रस्म नहीं, बल्कि यह भगवान कृष्ण के जन्म, सरलता और सच्ची भक्ति का एक सुंदर और प्रतीकात्मक तरीक़ा है।

घर में होता है सुख-समृद्धि का वास

कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, खीरा समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। इस प्रक्रिया को करने से घर में खुशियाँ, सौभाग्य और पैसा आता है। यह माना जाता है कि कृष्ण जन्म की प्रक्रिया पूरी करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

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