
इंडिया टीवी के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा।
भारतीय वस्तुओं के निर्यात पर ट्रंप का 50 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लागू हो गया। गणेशोत्सव की छुट्टी के बाद आज जब शेयर बाज़ार खुले, तो सेंसेक्स और निफ्टी में काफी गिरावट दर्ज़ की गई। सेंसेक्स 706 अंक गिर कर 80,080.57 पर बंद हुआ, जबाकि निफ्टी 211 अंक गिर कर 24,501 अंक पर बंद हुआ। कारोबारियों का कहना है कि ट्रम्प टैरिफ का बाज़ार के sentiment पर असर पड़ा लेकिन ये ज्यादा समय नहीं रहेगा और देर सबेर उछाल आएगा।
भारत से अमेरिका जाने वाले सामान पर साल भर पहले जो टैरिफ केवल 3% था, उसमें 50% और जुड़ गया। भारत, अमेरिका को 90 अरब डॉलर का सामान बेचता है, अब इनमें से 60 अरब डॉलर के माल पर 50% अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया गया है। ये भारतीय उद्योग के लिए बड़ी चुनौती है। इसका असर भारत के कपड़ा, गारमेंट्स, जेवरात, हीरा, shrimps, कारपेट और फर्नीचर उद्योग पर ज्यादा होगा। कुछ महीने के लिए इन फैक्ट्रियों के पास ज्यादा काम नहीं होगा। इनका उत्पादन घटेगा, मजदूरों को हटाया जाएगा।
नोट करने की बात ये है कि ट्रंप ने उन चीजों पर कोई टैरिफ नहीं लगाया है जिनकी जरूरत अमेरिका को है। इनमें स्मार्टफोन, दवाएं, और पेट्रोलियम उत्पाद शामिल हैं। नए रेट से हमारे टेक्सटाइल और कपड़ों पर आज से 62% टैरिफ लागू हो गया। इसका फायदा बांग्लादेश और मैक्सिको के कारोबारियों को होगा। उदाहरण के तौर पर हमारे यहां से जो शर्ट्स अमेरिका को निर्यात होती हैं, उन पर इस समय 12% ड्यूटी लगती है, जो अब से 62% हो गई। भारत में बनी शर्ट्स जब अमेरिकी बाजार में मंहगी होंगी, तो इसका फायदा वियतनाम को होगा जिसके सामान पर सिर्फ 20% टैरिफ है।
भारत अमेरिका को जो हीरा, सोना और जेवरात एक्सपोर्ट करता है, उसका वॉल्यूम अमेरिका के व्यापार में सबसे ज्यादा 40% है। परसों तक इस पर सिर्फ 2% टैरिफ था। ये कल से बढ़कर 52% हो गया। इसका असर सूरत और जयपुर जैसे शहरों के व्यापारियों और कारीगरों पर पड़ेगा। यानि ये तो साफ है कि ट्रंप के टैरिफ का नकारात्मक असर तो पड़ेगा। आकलन इस बात का करना है कि ये असर कितना होगा।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी टैरिफ पर तत्काल जवाब कदम उठाने के मूड में नहीं हैं। भारत ने अपने टेक्सटाइल, सी-फूड, लेदर, जेम्स ऐंड जूलरी एक्सपोर्टर्स के लिए outreach करने का फ़ैसला किया है। सरकार रूस, यूरोपियन यूनियन, ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया समेत क़रीब 40 देशों से बातचीत कर रही है जिससे इन देशों के साथ कारोबार बढ़ाया जा सके और अमेरिकी टैरिफ से निर्यात में आने वाली कमी की भरपाई की जा सके।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में अमेरिका के अतिरिक्त टैरिफ के असर का आकलन किया गया, सरकार ने तय किया है कि भारत के मित्र देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर ज़ोर दिया जाएगा। इसके अलावा घरेलू खपत बढाकर निर्यात को लगने वाले झटके में कमी लाने की कोशिश की जाएगी। ट्रंप ने टैरिफ लगाने में भी चालाकी की है। जिन चीजों की खपत अमेरिका में ज्यादा है, उन पर ट्रंप ने अतिरिक्त टैरिफ नहीं लगाया है। उदाहरण के तौर पर भारत अमेरिका को हर साल 9.5 अरब डॉलर की दवाएं निर्यात करता है। दवाओं पर पहले भी अमेरिका कोई टैरिफ़ नहीं लगाता था और अब भी नहीं लगेगा।
इसी तरह भारत दुनिया में स्मार्टफोन का सबसे बड़ा निर्माता है। भारत से हर साल 16.6 अरब डॉलर के स्मार्टफोन अमेरिका को निर्यात होते है। भारत के स्मार्टफ़ोन पर ज़ीरो टैरिफ़ था। ट्रंप ने इसको भी बक़रार रखा है। भारत के पेट्रोकेमिकल निर्यात पर भी अमेरिका ने कोई अतिरिक्त टैरिफ नहीं लगाया है। भारत हर साल अमेरिका को 4.1 अरब डॉलर के petro- chemical प्रोडक्ट बेचता है। पहले इस पर 6.9 परसेंट टैरिफ लगता था, अब भी इसी रेट से टैरिफ लगेगा। ट्रंप का 50% tariff भारत के लिए चुनौती तो है लेकिन कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा। इसका निर्यात पर असर पड़ेगा लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ट्रंप के tariff से भारत की अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी।
अगर बढ़े हुए tariff से हमारे निर्यातकों को परेशानी होगी तो अमेरिका में ट्रंप को उपभोक्ताओं की नाराजगी भी झेलनी पड़ेगी। मैंने कई Trade Experts से बात की। उनका कहना है कि ट्रंप के tariff से घबराने की जरूरत बिल्कुल नहीं है। वैश्विक स्थिति ऐसी है कि ये tariff ज्यादा दिन तक नहीं रह पाएगा। ट्रंप को इसे कम करना ही पड़ेगा क्योंकि ट्रंप का ये tariff merit पर नहीं है। भारत को परेशान करने के लिए ज्यादा है।
अमेरिका पर भी दोहरे मापदंड अपनाने का दबाव है। ट्रंप से पूछा जा रहा है कि रूस से तो चीन भी तेल खरीदता है, फिर उसे छोड़कर भारत पर 25% अतिरिक्त tariff क्यों लगाया गया? क्या ट्रंप ने रूसी तेल को बहाना बनाया? असली बात ये है कि मोदी ने कृषि और डेयरी उत्पादों के बाजार को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलने से साफ मना कर दिया है। इससे ट्रंप नाराज हो गए। जब भी अमेरिका से भारत की बात दोबारा शुरू होगी, तो ट्रंप से पूछा जाएगा कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों के साथ अलग-अलग तरीके से कैसे सलूक किया जा सकता है? भारत और चीन के लिए अलग अलग पैमाने क्यों?
ये भी पूछा जाएगा कि अगर ट्रंप भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगाते हैं तो चीन को छोड़ने का क्या औचित्य है? अमेरिकी व्यापार विशेषज्ञ भी ये मानते हैं कि 50% tariff लम्बे समय तक जारी नहीं रह सकता। ट्रंप प्रशासन पर अंदरूनी दबाव दिख रहा है। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि भारत और अमेरिका के रिश्ते बहुत अच्छे हैं, प्रधानमंत्री मोदी और डॉनल्ड ट्रंप के बीच भी अच्छा संबंध है। इसलिए उन्हें उम्मीद है कि जल्दी ही दोनों देश आपसी मसले सुलझा लेंगे और दोनों एक साथ आएंगे।
वोट चोरी: राहुल के तर्क बेमानी
सबसे दिलचस्प बात ये है कि भारत को नुकसान पहुंचाने वाले ट्रंप आजकल राहुल गांधी को बड़े अच्छे लगने लगे हैं। जो भी मोदी को परेशान करता है, वो राहुल के good books में आ जाता है। बिहार के मुजफ्फरपुर की रैली में राहुल गांधी ने ट्रंप के बहाने राजनैतिक मर्यादा की सीमा एक बार फिर पार कर दी। ट्रंप के बयान का हवाला देकर मोदी के लिए सड़क छाप भाषा में बात की। राहुल वोट चोरी का इल्जाम तो रोज लगाते हैं लेकिन कल उन्होंने ट्रंप के युद्ध रुकवाने वाले बयान का जिक्र किया। फिर गुजरात मॉडल पर आए और कहा कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह बीस साल से चुनाव आयोग की मदद से वोट चारी करके चुनाव जीत रहे हैं।
ये सही है कि राहुल गांधी के नेतृत्व की leadership में 11 साल में कांग्रेस मोदी से तीन बार लोकसभा का चुनाव हारी है, लेकिन इन्हीं 11 साल में एक बार बीजेपी राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का विधानसभा चुनाव एक साथ हारी थी। तेलंगाना, कर्नाटक और हिमाचल में तो आज भी कांग्रेस की सरकारें हैं। तो ये कैसे कहा जा सकता है कि 20 साल से मोदी ने वोट चोरी करके सारे चुनाव जीते? मुझे लगता है कि 11 साल से राहुल गांधी इस सवाल का जवाब तलाश रहे हैं कि कांग्रेस बार बार चुनाव क्यों हारती है? उन्होंने कभी नहीं माना कि मोदी ने लोकप्रियता के दम पर चुनाव जीते।
पहले राहुल कहते थे कि ED, CBI और Income Tax बीजेपी को चुनाव जिताती है लेकिन 10 साल तक ये सारी agencies कांग्रेस सरकार के पास थी। फिर भी कांग्रेस 2014 में बुरी तरह चुनाव क्यों हारी?
जब ये logic नहीं चला तो राहुल ने चुनाव में हार के लिए वोट चोरी को जिम्मेदार बताना शुरू कर दिया। अपने समर्थकों को बताने और समझाने के लिए तो ये तर्क चल सकता है कि मोदी कभी वोट घटा कर, तो कभी बढ़ा कर चुनाव जीत गए। लेकिन बाकी लोगों के लिए ये ना तो तार्किक है, ना ही विश्वसनीय। चुनाव आयोग जब चुनाव करवाता है तो इस पूरी प्रक्रिया में इतनी तादाद में सरकारी कर्मचारी, अफसरान, शिक्षक और राजनीतिक कार्यकर्ता जुड़े रहते हैं कि कोई किसी को हराने या जिताने की कोशिश करेगा तो तुरंत पकड़ा जाएगा। इसीलिए चुनाव आयोग पर या पूरी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाना बेमानी है। (रजत शर्मा)
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