EXPLAINER: अगर खुद की पार्टी करे वादाखिलाफी, ना दे पद-सम्मान, तो नेताजी बिना विधायकी गंवाए कैसे थाम सकते हैं दूसरे दल का दामन


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पार्टी बदलते समय नेताओं को किन बातों का ध्यान रखना होता है?

नई दिल्ली: कर्नाटक की सियासत आज ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां मुख्यमंत्री की कुर्सी महज एक पद नहीं, बल्कि दो दिग्गज नेताओं के बीच रस्साकशी का सेंटर बन चुकी है। एक तरफ सीएम सिद्धारमैया हैं, तो दूसरी तरफ डीके शिवकुमार। दोनों ही नेता पार्टी और विधायकों पर अपनी-अपनी पकड़ मजबूत करने में लगे हुए हैं। लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हो रहा। ये भी समझ लीजिए कि “कुर्सी की जंग” कभी अकेले होती, ये अपने साथ लाती है पार्टी टूटने की नौबत, बागी विधायकों की फौज और दल-बदल विरोधी कानून की तलवार, जो कभी भी गिर सकती है। महाराष्ट्र का हालिया सियासी भूचाल याद करिए- जब उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना 2 धड़ों में बंट गई, शरद पवार की एनसीपी भी टूट गई, और रातों-रात शुरू हुआ सरकार बदलने का खेल। तब उद्धव ठाकरे के सामने थे एकनाथ शिंदे और शरद पवार को चुनौती दे रहे थे अजित पवार। एक ही पार्टी, एक ही आईडियोलॉजी, लेकिन राजनीति का रास्ता अलग।

लेकिन असली सवाल है कि आखिर बिना सदस्यता गंवाए विधायक अपनी पार्टी कैसे बदल लेते हैं? किस नियम के चलते सरकारें रातों-रात गिर जाती हैं और बन भी जाती हैं? और दल-बदल विरोधी कानून में ऐसी कौन-सी छूट है जो इस तरह के राजनीतिक खेलों को मुमकिन बनाती हैं? इसी पूरी कहानी को आसान भाषा में समझने के लिए ये आर्टिकल पढ़िए, जिसमें आपको बताया जाएगा कि दल-बदल विरोधी कानून विधायकों की राह में कैसे रोड़ा बनता है, किस गलती के कारण विधायक अयोग्य ठहराए जाते हैं, और सरकार बनाने की खींचतान के बीच विधायक लोग खुद को कैसे बचाए रखते हैं।

जब एक नेता ने 9 घंटे में 3 बार बदली थी पार्टी

बात है साल 1967 की, जब हरियाणा के विधायक गया लाल ने कपड़ों की तरह पार्टियां बदली थीं। उनकी वजह से ही ”आया राम गया राम” जुमला अमर बना। गया लाल, 1967 में पहली बार विधायक बने थे। निर्दलीय उम्मीदवार गया लाल, हरियाणा की हसनपुर विधानसभा सीट से चुने गए थे। निर्दलीय विधायक बनने के कुछ ही घंटों बाद गया लाल, कांग्रेस में शामिल हो गए थे। लेकिन कुछ और घंटे बीतते ही उनका मन बदल गया और वह यूनाइटेड फ्रंट गठबंधन में शामिल हो गए। लेकिन पार्टी बदलना यहीं नहीं रुका। शाम होते-होते, गया लाल का मन फिर बदला और वह दोबारा कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। ऐसा करके गया लाल महज 9 घंटे में तीन बार पार्टी बदलकर ऐसा करने वाले पहले नेता बन गए। शाम को जब गया लाल फिर से कांग्रेस में शामिल हुए तो कांग्रेस नेता राव बीरेंद्र सिंह ने चंडीगढ़ में गया लाल के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें उन्होंने कहा, ”गया राम अब आया राम है।” और तभी से ”आया राम गया राम” कहावत मशहूर हो गई। फिर ऐसे ही नेताओं को रोकने के लिए दल-बदल विरोधी कानून बना।

दल-बदल विरोधी कानून कब और क्यों बना?

सबसे पहले तो ये समझ लीजिए दल-बदल विरोधी कानून यानी Anti Defection Law क्या है। दरअसल, दल-बदल विरोधी कानून भारत के संविधान का एक अहम कानूनी प्रावधान है, जो विधायक-सांसदों को एक सियासी दल से दूसरी पार्टी में जाने से रोकता है, जिससे कि राजनीतिक स्थिरता बनी रहे। इस कानून को साल 1985 में तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार में 52वें संविधान संशोधन के तहत बनाया गया था। इस कानून का मकसद “आया राम, गया राम” की सियासत पर लगाम लगाना था, जिसमें नेता अक्सर पर्सनल फायदे या मंत्री पद के लालच में दल बदल लेते थे।

नेताओं के खिलाफ दल-बदल विरोधी कानून कब करता है काम?

– जब कोई विधायक या सांसद अपने मन से किसी राजनीतिक दल को छोड़ता है, जिसके टिकट पर वह चुनाव लड़ा था तब दल-बदल विरोधी कानून काम करता है।

– जब कोई विधायक या सांसद, पार्टी के व्हिप के खिलाफ जाकर सदन में वोटिंग करता है या गैर मौजूद रहता है, ऐसे स्थिति में दल-बदल विरोधी कानून लागू होता है।

– अगर कोई निर्दलीय विधायक या सांसद चुनाव के बाद किसी सियासी दल में शामिल हो जाता है तो दल-बदल विरोधी कानून काम करता है।

दल-बदल विरोधी कानून कब लागू नहीं होता है?

समझ लीजिए कि दल-बदल विरोधी कानून, विलय के मामलों में नेताओं को छूट देता है। अगर किसी सियासी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरी पार्टी में एक साथ शामिल हो जाते हैं, तो उन नेताओं पर दल-बदल विरोधी कानून लागू नहीं होता है। ऐसी स्थिति में विधायक या सांसदों की सदस्यता नहीं जाती है। वे अयोग्य नहीं ठहराए जाते हैं। मान लीजिए कि किसी पार्टी के 24 विधायक हैं और उसमें 17 विधायक एक साथ किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं तो पार्टी छोड़ने वाले विधायकों पर कानून लागू नहीं होगा। उनकी विधायकी बनी रहेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि 24 का दो-तिहाई 16 होता है और 17 विधायकों के एक साथ दूसरी पार्टी में जाने से दल-बदल विरोधी कानून लागू नहीं होगा। तो अगर किसी विधायक या सांसद को अपनी सदस्यता बचाए रखनी होती है तो उसे अपनी पार्टी के दो-तिहाई विधायकों के साथ पाला बदलना होता है।

नेता की विधायकी/सांसदी पर फैसला कौन लेता है?

अगर किसी राज्य में या केंद्र में नेता अपनी पार्टी बदलते हैं तो उसकी सदस्यता रहेगी या नहीं, इसको लेकर फैसला सदन के पीठासीन अधिकारी को करना होता है। अगर किसी सांसद ने ऐसा किया है तो उसके अयोग्य ठहराए जाने का फैसला लोकसभा के स्पीकर और राज्यसभा में सभापति करते हैं। वहीं, विधायक की सदस्यता का निर्णय विधानसभा के अध्यक्ष को करना होता है। और हां, ये फैसला आखिरी नहीं होता है। अगर किसी सांसद या विधायक को सदन में अयोग्य ठहरा दिया गया है तो वह उस फैसले को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकता है।

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