रजत शर्मा का ब्लॉग | डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई चीज़ नहीं होती: लोग साइबर ठगों से बचें


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इंडिया टीवी के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा।

मैंने आपको कई बार बताया है कि साइबर अपराध करने वाले लोगों को कैसे ठगते हैं, कभी पुलिस स्टेशन जैसा माहौल बनाकर, कभी CBI या ED का अफसर बनकर, कभी कोर्ट कचहरी जैसा सेट बनाकर, जज बनकर लोगों को लूटते हैं। ऐसा ही एक मामला लखनऊ में हुआ। एक बुजुर्ग महिला को ये कहकर डराया गया कि उसके नंबर का इस्तेमाल पहलगाम हमले के आतंकवादियों को पैसा पहुंचाने के लिए किया गया। डरी हुई बुजुर्ग महिला को चार दिन तक डिजिटल अरेस्ट करके रखा गया। घबराकर ये महिला अपनी जिंदगी भर की जमापूंजी के डेढ़ करोड़ रुपये ठगों के बताए खाते में ट्रांसफर करने के लिए बैंक पहुंच गई। वो तो ऐन मौके पर बैंक के अधिकारियों को शक हो गया, उन्होंने महिला को सतर्क किया लेकिन वो महिला पैसे ट्रांसफर करने की जिद पर अड़ी रही। वो घबराई हुई थी। बैंक अफसरों को फोन तक दिखाने से इंकार कर दिया। बैंक के अफसरों ने तीन घंटे तक उसे समझाया, फिर पुलिस को बुलाया। तब जाकर महिला ने पूरी बात बताई। जैसे ही पुलिस सक्रिय हुई, तो ठगों ने फोन डिस्कनैक्ट कर दिया। आखिरकार महिला ठगी का शिकार होने से बच गई।

इस केस को देखना और समझना इसीलिए जरूरी है क्योंकि हजारों लोग इसी तरह जालसाजी का शिकार होते हैं। लोगों में जागरूकता पैदा करने की ज़रूरत है। लखनऊ के विकास नगर में रहने वाली उषा शुक्ला के पास unknown नंबर से फ़ोन आया। कॉल करने वाले शख्स ने खुद को CBI अफसर बताया,  कहा कि इस नंबर का इस्तेमाल आतंकवादी घटनाओं में हुआ है। यह सुनकर ऊषा शुक्ला बुरी तरह घबरा गईं। उन्होंने इंडिया टीवी की संवाददाता रुचि कुमार को बताया कि कॉल करने वाला पुलिस की ड्रेस में था, वहां दो लोग और बैठे थे जिसमें एक महिला भी थी। इन ठगों ने उषा शुक्ला से कहा कि अगर वो गिरफ़्तारी से बचना चाहती हैं तो डिजिटल अरेस्ट रहना पड़ेगा, घर में किसी से बात नहीं करेगी, किसी को कुछ नहीं बताएंगी। उषा शुक्ला घर में अकेले रहती हैं। बच्चे बाहर रहते हैं। उनके पास पहली बार साइबर ठगों का फ़ोन 11 दिसंबर को आया था। उसके बाद से ठग लगातार उनके कॉन्टैक्ट में थे। घर में नौकरानी के आने पर भी पांबदी लगा दी थी।

ठगों ने उषा शुक्ला को निर्देश दिया था कि वो चौबीसों घंटे वीडियो कॉल पर रहेंगी, सुबह जागते ही वीडियो कॉल पर गुड मार्निंग कहेंगी, हर घंटे मैसेज देंगी, सोने से पहले गुड नाइट कहेंगी, लेकिन फोन ऑफ नहीं करना है। उषा शुक्ला ठगों की बातों से इतना डर गई थीं कि उन्होंने अपने बेटे को भी नहीं बताया कि उनके साथ क्या हो रहा है। ठगों ने उषा शुक्ला से उनके बैक खातों का ब्यौरा लिया। जब ठगों को पता लग गया कि महिला के पास डेढ़ करोड़ की FD हैं तो उन्होंने एक अकाउंट नंबर दिया और कहा कि सारा पैसा इस अकाउंट में ट्रांसफर कर दे। जांच के बाद दो-तीन दिन में पैसा वापस आ जाएगा। साथ में ये धमकी भी दी कि अगर किसी को इसकी जानकारी दी तो उसके परिवार वालों की जान खतरे में आ सकती है। इसके बाद, उषा शुक्ला सीधे विकास नगर में पंजाब नेशनल बैंक की ब्रांच में पहुंचीं। बैंक अफसरों से अपनी 13 Fixed Deposit को तुड़वा कर ठगों की तरफ से बताए गए खाते में पैसा ट्रांसफर कराने को कहा।

बैंक में काउंटर पर बैठी महिला को उषा शुक्ला के हावभाव पर शक हुआ। उसने अपने सीनियर को जानकारी दी। सीनियर ने पुलिस को कॉल किया क्योंकि उषा इस क़दर ठगों की बातों के जाल में फंसी हुई थीं कि किसी को कुछ बताने को तैयार नहीं थी। पुलिस पहुंची तो सारा सच सामने आ गया। उषा शुक्ला ठगी का शिकार होने से बच गईं। बैंक में उषा शुक्ला की बात सबसे पहले एक कर्मचारी अंकिता से हुई। अंकिता ने उषा शुक्ला से बार-बार पूछा कि वो सारा का सारा पैसा क्यों ट्रांसफर करना चाहती है। अंकिता ने उषा को बहुत समझाया लेकिन उषा जी कुछ भी बताने को तैयार नहीं थीं। इससे उन्हें लगा कि जरूर कोई गड़बड़ है,  तब उन्होंने ब्रांच मैनेजर को बताया। ब्रांच मैनेजर श्रवण राठौर ने उषा शुक्ला से ख़ुद बात की। तीन घंटे तक अपने पास बैठाए रखा। फिर ये कहकर टालने की कोशिश की कि जो एकाउंट नंबर दिया गया है, वो ग़लत है।

इसके बाद उषा शुक्ला बैंक से बाहर गईं। बाहर जाकर चुपके से ठगों से फिर से बात करने लगीं तो बैंक मैनेजर ने चपरासी को उन पर नज़र रखने को कहा। जब बैंक वालों को भरोसा हो गया कि वो इस वक़्त डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगों के जाल में फंसी हुई हैं, तो बैंक मैनेजर ने पुलिस को बुला लिया। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगने वाले भोले भाले लोगों से तीन हजार करोड़ रुपये से ज्यादा अब तक लूट चुके हैं। पिछले दिनों जब ये आंकड़ा सुप्रीम कोर्ट  के सामने आया तो चीफ जस्टिस सूर्यकांत भी चौंक गए। उन्हें ज़रा भी अंदाजा नहीं था कि ठगी का दायरा इतना बड़ा हो सकता है। डिजिटल अरेस्ट का स्केल कितना भयानक है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस साल के शुरुआत के दो महीने में डिजिटल अरेस्ट के 17,718 केस दर्ज किये गए। डिजिटल अरेस्ट के शिकार ज्यादातर बुजुर्ग होते हैं जिन्हें डराकर उनके बैंक से पैसा ट्रांसफर करा लिया जाता है, जालसाजी करने वाले कभी नकली पुलिस स्टेशन दिखाते हैं तो कभी फर्जी कोर्ट दिखाकर लोगों को जेल का डर दिखाते हैं।

ये बेईमान लोग फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल भी करते हैं। ज्यादातर मामलों में ये अपराधी बाहर के मुल्कों से काम करते हैं। इसीलिए एक बार पैसा ट्रांसफर हो गया तो उसे वापस लाना मुश्किल हो जाता है। इसीलिए डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराध से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार है – जागरूकता। मैं एक बार फिर कहना चाहता हूं कि डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई चीज नहीं होती। अगर कोई इस तरह की धमकी दे तो तुरंत अपने आसपास के लोगों को या पुलिस को रिपोर्ट करें। सरकार ने साइबर क्राइम को रिपोर्ट करने के लिए अलग हैल्पलाइन नंबर जारी किया है। ये नंबर है 1930। अगर आपके साथ इस तरह की कोई घटना होती है तो 1930 पर जरूर रिपोर्ट करें। जितनी जल्दी रिपोर्ट करेंगे, अपराधियों के पकड़े जाने की संभावना उतनी ज्यादा बढ़ जाएगी। लखनऊ वाले केस में भी अगर बैंक की अफसर सतर्क न होती, समझदारी न दिखाती तो एक और बुजुर्ग ठगी का शिकार हो जातीं। (रजत शर्मा)

देखें: ‘आज की बात, रजत शर्मा के साथ’ 18 दिसंबर, 2025 का पूरा एपिसोड

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