झारखंड में खत्म हुआ 24 साल का इंतजार, PESA नियमावली को कैबिनेट ने दी मंजूरी


झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन- India TV Hindi
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झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन

झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने राज्य के आदिवासी समुदायों के अधिकारों को मजबूती प्रदान करने के लिए एक बड़ा ऐतिहासिक फैसला लिया है। मंगलवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में ‘पंचायत विस्तार अधिनियम’ यानी पेसा (PESA) नियमावली को आधिकारिक मंजूरी दे दी गई है।

राज्य गठन के 24 साल बाद झारखंड में इस कानून के लागू होने का रास्ता साफ हो गया है, जो अनुसूचित क्षेत्रों में स्वशासन की व्यवस्था को नई परिभाषा देगा। कैबिनेट सचिव वंदना डाडेल और पंचायती राज सचिव मनोज कुमार ने जानकारी देते हुए बताया कि इन नियमों के तहत ग्राम सभाओं को जमीनी स्तर पर बेहद शक्तिशाली बनाया गया है। अब अनुसूचित क्षेत्रों में कोई भी बड़ा निर्णय ग्राम सभा की सहमति के बिना नहीं लिया जा सकेगा।

इन प्रमुख क्षेत्रों में ग्राम सभाओं का होगा नियंत्रण-

  1. खनन पट्टा देने या किसी भी परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण करने से पहले अब ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति लेनी होगी।
  2. जंगल से प्राप्त होने वाली लघु वन उपज पर अब स्थानीय समुदायों का पूरा अधिकार होगा।
  3. ग्रामीण क्षेत्रों में साहूकारों द्वारा किए जाने वाले शोषण और साहूकारी प्रथा पर प्रतिबंध लगाने की शक्ति अब ग्राम सभा के पास होगी।
  4. स्थानीय जल निकायों और जल संसाधनों के प्रबंधन की जिम्मेदारी भी अब सीधे ग्राम सभा की होगी।

13 जिलों पर होगा सीधा असर

पंचायती राज विभाग के अनुसार, झारखंड के 24 जिलों में से 13 जिले पूरी तरह और 2 जिले आंशिक रूप से संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आते हैं। इन क्षेत्रों में पेसा कानून लागू होने से सीधे तौर पर करोड़ों आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा होगी।

24 साल का लंबा इंतजार हुआ खत्म

मालूम हो कि केंद्र सरकार ने 1996 में पेसा अधिनियम पारित किया था। साल 2000 में बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य बना, लेकिन पिछले दो दशकों से यहां पेसा नियमावली अटकी हुई थी। हेमंत सोरेन कैबिनेट के इस फैसले ने अब उस लंबी प्रतीक्षा को समाप्त कर दिया है।

क्या है PESA कानून?

पेसा (PESA) कानून का मुख्य उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में पारंपरिक ग्राम सभाओं के माध्यम से स्वशासन को बढ़ावा देना है। यह कानून आदिवासी समाज की परंपराओं, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक संसाधनों के संरक्षण की गारंटी देता है।

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