
आरागॉन के राजा फर्डिनैंड द्वितीय एवं उनकी पत्नी कैस्टिले की रानी इसाबेला प्रथम के सामने आत्मसमर्पण करते हुए ग्रेनाडा के अंतिम शासक अबू अब्दुल्ला मुहम्मद XII।
Granada War: 2 जनवरी इतिहास में एक ऐसी तारीख के रूप में दर्ज है जब इबेरियन प्रायद्वीप से मुस्लिमों के सदियों पुराने शासन का खात्मा हो गया था। 1482 से लेकर 1492 तक चली ग्रेनाडा की जंग ने स्पेन से मुसलमान शासकों को अपना अंतिम गढ़ छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। ये लड़ाई कैस्टिले की रानी इसाबेला प्रथम और उनके पति एवं आरागॉन के राजा फर्डिनैंड द्वितीय के शासनकाल में हुआ। इस जंग में कैस्टिले और आरागॉन की संयुक्त सेनाओं ने नासरी राजवंश की ग्रेनाडा अमीरात को धूल चटा दी थी। इस जंग के बाद इबेरियन प्रायद्वीप यानी कि आज के स्पेन और पुर्तगाल पर इस्लामी शासन का अंतिम गढ़ भी जमींदोज हो गया था। आइए, इस जंग से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातों के बारे में जानते हैं।
तोपों ने ईसाइयों को मुस्लिमों पर दिलाई थी बड़ी जीत
ग्रेनाडा की लड़ाई को ‘रिकॉन्क्विस्टा’ यानी कि ईसाईयों द्वारा मुसलमानों से अपनी जमीन वापस लेने की प्रक्रिया का अंतिम चरण माना जाता है। यह जंग कुल मिलाकर 10 साल चली थी, जो कि वसंत के मौसम में शुरू होती और सर्दियों में रुक जाती थी। ग्रेनाडा के लोग आंतरिक झगड़ों और गृहयुद्ध से कमजोर हो चुके थे, जबकि ईसाई पक्ष एकजुट था। हमलों से बचने के लिए कैस्टिले को ग्रेनाडा टैक्स देता था, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई। जंग के दौरान ईसाईयों ने तोपों का बखूबी इस्तेमाल किया, जिससे ग्रेनाडा के तमाम शहर बहुत जल्दी ही उनके कब्जे में आ गए।

ईसाई सेनाओं के सामने हार के बाद अपने महल में अबू अब्दुल्ला मुहम्मद XII के परिवार को दिखाती एक पेंटिंग।
2 जनवरी 1492 को स्पेन से खत्म हुआ मुस्लिम शासन
2 जनवरी 1492 को ग्रेनाडा के अंतिम शासक अबू अब्दुल्ला मुहम्मद XII कैस्टिले की सेनाओं के सामने सरेंडर कर दिया। इस जंग में कैस्टिले और आरागॉन की सेनाओं ने मिलकर हिस्सा लिया था, लेकिन ज्यादातर सैनिक और पैसे कैस्टिले से आए थे। जंग के बाद ग्रेनाडा को कैस्टिले में मिला लिया गया, जबकि आरागॉन को नेवी मिली, तोपें मिली और ढेर सारे पैसे मिले। कुल मिलाकर, इस जंग के बाद यूरोप में स्पेन एक बहुत बड़ी ताकत बनकर उभरा और मुस्लिम शासन को अपनी जमीन से उखाड़ फेंकने में सफलता हासिल की। जंग में ग्रेनाडा के कम से कम एक लाख लोग मारे गए, या उन्हें गुलाम बना लिया गया।
मुसलमानों को माननी पड़ी थी ईसाइयों की शर्तें
ग्रेनाडा की लड़ाई के बाद मुसलमानों के सामने ईसाइयों ने समर्पण की कुछ शर्तें रखी थीं, जिनके तहत वे 3 साल तक ग्रेनाडा आ-जा सकते थे, बंदूकों को छोड़कर बाकी हथियार रख सकते थे और किसी का जबरन धर्म परिवर्तन नहीं किया जाना था। हालांकि बाद में शर्तें बेमतलब साबित हुईं और कई शर्तों को बदल दिया गया। मुहम्मद XII को ईसाइयों ने थोड़े-बहुत पैसे और पहाड़ी इलाके में एक छोटी सी रियासत दी, जो उन्हें पसंद नहीं आई। आखिरकार 1493 में मुहम्मद XII सब कुछ छोड़कर मोरक्को चले गए जहां कई सालों बाद उनकी मौत हो गई।

मुहम्मद XII के आत्मसमर्पण को दिखाती एक और पेंटिंग।
जंग के बाद मुसलमानों में फैल गया था मातम
ग्रेनाडा की जीत को ईसाई दुनिया में बड़ी कामयाबी माना गया। इसने कॉन्स्टेंटिनोपल के 1453 में ओटोमन तुर्कों के हाथों हार जाने के दर्द को काफी कम कर दिया था। जंग में जीत के बाद स्पेन में जबरदस्त जश्न मनाया गया। अन्य ईसाई देशों ने फर्डिनैंड और इसाबेला को बधाई दी, जबकि मुसलमानों में मातम फैल गया। लड़ाई के कुछ सालों बाद ही 1501 तक आदेश जारी हुआ कि ग्रेनाडा के सभी मुसलमानों या तो ईसाई बनें, या गुलाम बनें या इलाके को छोड़कर चले जाएं। 1526 तक पूरे स्पेन में यही नियम लागू कर दिया गया। इस नियम की जद में मुसलमान और यहूदी दोनों आए थे, और इसकी वजह से बड़ी संख्या में लोग मारे भी गए।
स्पेन में बद से बदतर हो गई मुसलमानों की हालत
कुल मिलाकर ग्रेनाडा युद्ध के कुछ सालों के बाद ही स्पेन में मुसलमानों की हालत बेहद दयनीय हो गई थी। ईसाई शासकों ने नियम इतने सख्त कर दिए कि आखिरकार तमाम लोगों को धर्म परिवर्तन करना पड़ा। जंग के बाद इसाबेला और फर्डिनेंड ने कोलंबस को उसकी यात्रा के लिए फंडिंग दी और उसने अमेरिका की खोज की, जिससे स्पेन आखिरकार वैश्विक शक्ति बना। ग्रेनाडा की लड़ाई ने 700 साल तक चले रिकॉन्क्विस्टा को अंजाम तक पहुंचाया और ईसाइयों ने आखिरकार मुसलमानों के हाथों हारी गई अपनी जमीन को वापस जीत लिया। इस लड़ाई ने आज की दुनिया के नक्शे को बनाने में अहम रोल अदा किया।
