
भारतीय संसदीय इतिहास में बजट केवल आंकड़ों का खेल नहीं रहा है, बल्कि यह औपनिवेशिक विरासत को छोड़ने और भारतीयता को अपनाने का भी गवाह रहा है। एक समय था जब भारत का बजट शाम के 5 बजे पेश किया जाता था, लेकिन आज यह परंपरा बदल चुकी है। आखिर क्यों बजट शाम को पेश होता था और वह क्या कारण थे जिसने भारत को अपनी 70 साल पुरानी परंपरा बदलने पर मजबूर कर दिया? आइए जानते हैं।
शाम 5 बजे पेश होता था देश का आम बजट
ब्रिटिश हुकूमत और शाम 5 बजे का कनेक्शन आजादी के बाद कई दशकों तक भारत में बजट फरवरी के आखिरी कार्य दिवस पर शाम 5 बजे पेश किया जाता था। इसकी जड़ें ब्रिटिश काल में छिपी थीं। दरअसल, ब्रिटिश संसद (लंदन) और भारतीय संसद के समय में 5:30 घंटे का अंतर है। जब भारत में शाम के 5 बजते थे, तब लंदन में सुबह के 11:30 बज रहे होते थे। ब्रिटिश अधिकारी चाहते थे कि जब भारत में बजट पेश हो, तो लंदन के राजनेता और व्यापारी इसे अपने कामकाजी घंटों के दौरान आसानी से सुन सकें।
1999: जब बदली गई 70 साल पुरानी परंपरा
इस परंपरा को तोड़ने का श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को जाता है। 1999 में तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने पहली बार बजट पेश करने का समय सुबह 11 बजे तय किया। इसके पीछे तर्क यह था कि बजट शाम को पेश होने से रात भर बाजार और मीडिया में केवल अटकलें चलती थीं और विस्तृत विश्लेषण के लिए समय नहीं मिल पाता था। सुबह 11 बजे बजट पेश करने से दिनभर इस पर चर्चा और डेटा विश्लेषण का पर्याप्त समय मिलने लगा।
2017 में आया एक और बड़ा बदलाव
2017 में एक और बड़ा बदलाव सिर्फ समय ही नहीं, बल्कि बजट की तारीख भी बदली गई। 2017 तक बजट फरवरी के आखिरी दिन पेश होता था, लेकिन पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसे 1 फरवरी कर दिया। इसका उद्देश्य 1 अप्रैल से शुरू होने वाले नए वित्त वर्ष से पहले सभी विधायी कार्यों और बजटीय आवंटन को पूरा करना था। साथ ही, इसी साल 92 साल पुराने रेल बजट को भी आम बजट में मिला दिया गया।
