क्या है भारत-अमेरिका ऊर्जा गलियारा, जिस पर ह्यूस्टन में बंद कमरे में हुई अधिकारियों के साथ बड़ी बैठक


पीएम मोदी (बाएं) और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (दाएं) (फाइल फोटो)- India TV Hindi
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पीएम मोदी (बाएं) और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (दाएं) (फाइल फोटो)

ह्यूस्टन: भारत 2047 तक विकसित होने के लक्ष्य के तहत अपनी प्राथमिकताओं को लगातार हासिल करने का प्रयास कर रहा है। इसके लिए ऊर्जा जरूरतें भी बड़ी और अहम प्राथमिकताओं में हैं, क्योंकि भारत के उच्च आर्थिक विकास की महत्वाकांक्षा उसके दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा से गहराई से जुड़ी हुई है। यह बात भारत के ह्यूस्टन में महावाणिज्य दूत डी सी मंजुनाथ ने कही। उन्होंने अमेरिकी उद्योग के साथ संवाद और सहयोग की अहमियत पर जोर दिया। ताकि विश्वसनीय और किफायती ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित हो सके, साथ ही स्वच्छ तकनीकों और नवाचार को बढ़ावा मिले।

कई बड़ी ऊर्जा कंपनियों के प्रतिनिधि हुए शामिल

भारत के महावाणिज्य दूतावास (CGI) ह्यूस्टन ने बुधवार को अपने कार्यालय में अमेरिका-भारत स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिफ फोरम (USISPF) के सहयोग से ‘ग्लोबल एनर्जी आउटलुक 2026’ पर एक उच्च-स्तरीय अमेरिका-भारत ऊर्जा राउंडटेबल का आयोजन किया। यह अहम बैठक बंद कमरे में आयोजित की गई। इसमें वैश्विक ऊर्जा, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी कंपनियों के 30 से अधिक वरिष्ठ कार्यकारी शामिल हुए, जिनमें ExxonMobil, Chevron, Honeywell, GAIL, Larsen & Toubro, Weatherford, LanzaTech, S&P Global, McKinsey और Society of Petroleum Engineers के प्रतिनिधि शामिल थे। महावाणिज्य दूतावास ने कहा कि यह राउंडटेबल नीति-निर्माताओं और उद्योग नेताओं के बीच साझा ऊर्जा चुनौतियों तथा व्यावसायिक अवसरों पर संवाद के लिए मंच उपलब्ध कराने के उसके निरंतर प्रयासों का हिस्सा है। इसका मतलब भारत की ऊर्जा दक्षता को बढ़ाना है। 

आद्यौगिक और विमानन क्षेत्र पर रहा फोकस

यह बैठक फरवरी 2026 में भारत-अमेरिका व्यापार फ्रेमवर्क के बाद हुई, जिसमें ऊर्जा और प्रौद्योगिकी सहयोग को द्विपक्षीय विकास के मुख्य चालकों के रूप में चिह्नित किया गया था। LanzaTech और Honeywell जैसी कंपनियों की भागीदारी से सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल और कार्बन रिसाइक्लिंग जैसी तकनीकों में बढ़ती व्यावसायिक रुचि का संकेत मिला, जो भारत के औद्योगिक और विमानन क्षेत्रों के लिए प्रासंगिक हैं। USISPF के अनुसार, चर्चा वैश्विक आपूर्ति-मांग रुझानों, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और नीति फ्रेमवर्क पर केंद्रित रही, जो अमेरिकी ऊर्जा कंपनियों तथा भारतीय सार्वजनिक-निजी क्षेत्र के बीच गहन व्यावसायिक जुड़ाव को सक्षम बना सकती हैं।

क्या है भारत-अमेरिका ऊर्जा गलियारा?

भारत-अमेरिका ऊर्जा गलियारा एक रणनीतिक और व्यावसायिक संवाद का रूपक है, जो भारत और अमेरिका के बीच ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ती सहयोग, व्यापार और निवेश को दर्शाता है। यह कोई भौतिक गलियारा नहीं है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला, स्वच्छ ऊर्जा तकनीक और आर्थिक विकास से जुड़े द्विपक्षीय प्रयासों का प्रतीक है। यह अवधारणा हाल के वर्षों में उभरी है, खासकर 2025-2026 में ट्रंप प्रशासन के दौरान भारत-अमेरिका व्यापार समझौते (ट्रेड डील) के बाद, जहां ऊर्जा को द्विपक्षीय विकास का मुख्य चालक माना गया।

इसमें शामिल प्रमुख पहलू:ऊर्जा व्यापार बढ़ाना, अमेरिका से LNG, कच्चा तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की भारत की खरीद बढ़ाना। अमेरिका भारत के लिए महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार बन रहा है, जहां द्विपक्षीय ऊर्जा व्यापार 13-14 अरब डॉलर से अधिक पहुंच चुका है।  भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग (औद्योगिक विस्तार, शहरीकरण और बिजली खपत से) को पूरा करने के लिए अमेरिकी कंपनियां (जैसे ExxonMobil, Chevron, Honeywell) सक्रिय हैं। इसका रणनीतिक उद्देश्य चीन पर निर्भरता कम करना, क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना और इंडो-पैसिफिक में स्थिरता लाना है। 

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