EXCLUSIVE: महज 4 साल में नेपाल में सत्ता के शीर्ष की तरफ कैसे बढ़े बालेन शाह, पुराने नेता क्यों चूके और इसका भारत से संबंधों पर क्या होगा असर? एक्सपर्ट से समझिए


Balen Shah victory- India TV Hindi
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सियासत में बदलाव क्या बदल पाएगा नेपाल की किस्मत?

नेपाल की सियासत इस समय ऐतिहासिक करवट ले रही है। राजघरानों, कम्युनिस्टों और पारंपरिक राजनीतिक पार्टियों के आस-पास घूमने वाली सरकार अब एक युवा नेता Balen Shah के हाथों में जा रही है। काठमांडू के मेयर के तौर पर अपनी पहचान बनाने वाले बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी यानी RSP आम चुनाव परिणाम में भारी बढ़त के साथ नेपाल की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत कर रही है।

Gen-Z प्रदर्शन, करप्शन के खिलाफ गुस्सा और सोशल मीडिया की ताकत ने नेपाल में एंटी-इनकम्बेंसी को जन्म दिया। लेकिन नए नेता Balen Shah ने देश की सत्ता में शीर्ष तक पहुंचने की यह यात्रा इतनी तेजी से कैसे तय की? पुराने नेता क्यों चूक गए? और सबसे बड़ा सवाल इस नई, युवा और मुखर लीडरशिप के आने से भारत-नेपाल संबंधों पर क्या असर पड़ेगा? इन तमाम ज्वलंत मुद्दों और नेपाल की सियासत के बदलते समीकरणों को समझने के लिए INDIA TV ने साउथ एशिया मामलों के एक्सपर्ट डॉ. श्रीश पाठक से बात की, जिसमें उन्होंने बेहद तार्किक ढंग से समझाया है कि नेपाल की सत्ता में कोई भी आए, लेकिन अर्थव्यवस्था और रेमिटेंस जैसी जरूरतों के चलते वह चाहकर भी भारत के रोल को नजरअंदाज नहीं कर सकता।

सवाल- बालेन शाह इतनी तेजी से नेपाल की राजनीति में क्यों उठ गए, बाकी नेता कहां उनसे पीछे रह गए?

जवाब- डॉ. श्रीश पाठक ने कहा कि बालेन शाह का उभरना और आज की जो कंटेंपरेरी वर्ल्ड पॉलिटिक्स है, जिसमें हम कहते हैं कि टेक्नोलॉजी का रेवोल्यूशन बहुत तगड़ा रोल प्ले करता है; तो बालेन शाह की पूरी कैरेक्टरिस्टिक्स वैसी ही हैं। अभी वो सिर्फ 35 साल के हैं, लेकिन पब्लिक लाइफ में उनका आना 2013 में हुआ था, जब उन्होंने अपना रैप किया था। वैसे तो बहुत लोग रैप करते हैं, लेकिन रैप की जो अपनी हिस्ट्री है कि रैप इसी ट्रेडिशन में आया ही था कि मेनस्ट्रीम के अगेंस्ट जाकर करप्शन और बाकी सारी चीजों के खिलाफ आवाज उठाई जाए। 

उन्होंने कहा, ‘अमेरिका में भी रैप की यही हिस्ट्री रही है और नेपाल में भी बालेन शाह ने इसे ऐसे ही शुरू किया, इसलिए जनता ने उसको बहुत पसंद किया। और फिर निर्दलीय उम्मीदवार बनकर उन्होंने मेयर का चुनाव लड़ा और मेयर बनने के बाद जो अपना काम किया, वह भी जनता को बहुत पसंद आया। हालांकि, बालेन शाह उस तरह की एक्टिव पॉलिटिक्स में तो नहीं थे जिसे हम पार्टी पॉलिटिक्स कहते हैं, लेकिन पब्लिक लाइफ में उन्होंने अपने काम से अपनी एक इमेज जरूर बनाई।’

एक्सपर्ट बोले कि इलेक्शन पॉलिटिक्स में वे मेयर वाले चुनाव के जरिए आए, और क्योंकि काठमांडू कैपिटल सिटी है, तो वहां अगर आप कोई काम करते हैं तो सोशल मीडिया आपको हाथों-हाथ लेता है; उन्होंने जमीनी स्तर पर भी काम किए। तो बालेन शाह का उभरना और जिस तरह से GenZ प्रोटेस्ट हुआ, ये सारी चीजें आपस में इंटरकनेक्टेड भी हैं और मुझे लगता है कि यह आज की वर्ल्ड पॉलिटिक्स के ट्रेंड के बिल्कुल साथ ही जाता है।

सवाल- नेपाल की राजनीति अभी तक राजघरानों के इर्द-गिर्द घूमती रही है, अब युवाओं और नई पार्टी के हाथ में सत्ता जाना कैसा रहने वाला है।

जवाब- डॉ. श्रीश पाठक ने कहा कि नेपाली राजनीति में राजघराने का एक इम्पैक्ट रहता है। लेकिन अगर हम आइडियोलॉजी वाइज देखें, तो जो सेंट्रिस्ट पार्टियां हैं, जैसे नेपाली कांग्रेस है, उनका एक धड़ा मतलब एक तरह से ऐसी पार्टी है जो सेंट्रिस्ट पार्टी कहलाती है, जिनकी लिबरल पॉलिसीज के बारे में हम समझते हैं। दूसरी तरफ, माओवादी और कम्युनिस्ट पार्टियां मिलकर हैं, जिन्हें ओली या प्रचंड लीड करते हैं। तो नेपाल में एक तरफ हमारे पास ऐसी पार्टियां थीं जिन्हें आप जनरलाइज करने के लिए वामपंथी कह लें, और दूसरी तरफ सेंट्रिस्ट-राइट पार्टियां थीं।

उन्होंने कहा, ‘अब बालेन शाह की जो पार्टी है, RSP, वह भी एक सेंट्रिस्ट पार्टी है। तो इसका मतलब ये है कि वे नेशनलिस्ट होंगे, लेकिन ग्लोबलाइजेशन के साथ जाएंगे और लिबरल पॉलिसीज के साथ जाएंगे। इसका मतलब ये भी है कि वे फॉरेन पॉलिसी में कोऑपरेशन और कम्पटीशन को जरूर प्रेफर करेंगे। तो जैसे नेपाली कांग्रेस के समय पर अमूमन चीजें रहती हैं, मैं ऐसा समझता हूं कि चुनाव जीतकर अगर RSP पार्टी सत्ता में आती है, या अगर गठबंधन भी होता है, तो भी लीडरशिप उनकी ही होनी चाहिए। मेरे ख्याल से बाकी सारी चीजों में उनकी लिबरल पॉलिसीज ही होंगी।’

एक्सपर्ट बोले कि लेकिन मैं थोड़ी तुलना करना चाहूं, हालांकि उम्र के हिसाब से तुलना ठीक नहीं रहेगी, लेकिन अगर आपको थोड़ा सा याद हो कि दिल्ली में जब आम आदमी पार्टी पहली या दूसरी बार सरकार में आई थी, तो जिस तरह का रिटोरिक चलता था और जैसा सोशल मीडिया-पब्लिक सपोर्ट था यानी एक नए तरह की राजनीति करने की जो कोशिश थी, वह बालेन शाह के साथ भी जरूर जाएगी।

सवाल- रुझानों में आधे से अधिक सीटों पर बालेन शाह की पार्टी भारी बढ़त के साथ आगे चल रही है। आप इसका क्या कारण मानते हैं।

जवाब- डॉ. श्रीश पाठक ने कहा, ‘नेपाल की राजनीति में अगर आप पिछले 11-15 साल में देखें तो करीब 13-14 से ज्यादा सरकारें आ चुकी हैं। और जब GenZ प्रोटेस्ट हुआ, तो उस प्रोटेस्ट की वजह से जो सरकार गिरी, वह एक तरह से चुनी हुई सरकार थी; उसके पास भारी मेजॉरिटी थी। वह एक गठबंधन सरकार थी। वहां वामपंथी सरकार को नेपाली कांग्रेस का सपोर्ट भी था। फिर करप्शन का पूरा मुद्दा बनाया गया और सोशल मीडिया पर बैन जैसी चीजें भी हुईं।’

उन्होंने कहा, ‘तो किसी भी देश में, और हम नेपाल की बात तो करेंगे ही, वहां भी यूथ का जो रोल है, खासकर आज का इंटरकनेक्टेड यूथ, जो सिर्फ अपने देश तक सीमित नहीं रहता बल्कि सोशल मीडिया की वजह से पूरी दुनिया से कनेक्ट होता है। दुनिया में क्या चल रहा है और आगे क्या आकांक्षाएं हैं, उनके साथ यूथ बहुत कनेक्ट होता है; उसकी अपनी भी एस्पिरेशन्स होती हैं।’

एक्सपर्ट बोले कि मुझे ऐसा लगता है कि बालेन शाह की उम्र, उनका काम और उनका बैकग्राउंड यूथ को बहुत अपील करता है, और जेन-जी प्रोटेस्ट के बाद से तो उनका रोल बहुत ही इंपॉर्टेंट हो गया है। अगर बालेन शाह आगे बढ़कर पीएम बनते हैं, जैसा कि लग रहा है कि ऐसा हो सकता है, तो दुनिया में इसके और भी एग्जांपल हैं। जैसे जेलेंस्की हैं और एक-दो लोग और भी हैं, जिन्होंने अच्छे और इम्पैक्टफुल काम किए भी हैं।

सवाल- बालेन शाह जैसे युवा और नए नेता की जो लहर नेपाल में दिख रही है, उसका भारत-नेपाल संबंधों पर क्या असर पड़ेगा?

जवाब- डॉ. श्रीश पाठक ने कहा कि जैसा मैंने इशारा किया कि ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी’ एक सेंट्रिस्ट पार्टी है। इसलिए उन्हें भारत सरकार के साथ अपने संबंध अच्छे रखने ही होंगे। हालांकि, वे अपनी डिमांड्स को लेकर बहुत स्पष्ट और तेज होंगे, जिस पर हमें ध्यान देना पड़ेगा। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि भारत-नेपाल की जो जियोपॉलिटिकल सिचुएशन है, उसमें नेपाल में किसी की भी सरकार हो, वह भारत को इग्नोर नहीं कर सकती।

उन्होंने कहा, ‘इसमें मैं दो चीजें हाईलाइट करना चाहता हूं। एक तो नेपाल में बहुत तगड़ा रेमिटेंस आता है। और उस रेमिटेंस का मुख्य सोर्स वेस्ट एशिया में काम करने वाले नेपाली लोग हैं, वहां से एक तगड़ा रेमिटेंस आता है। तो वेस्ट एशिया में जो कुछ भी हो रहा है, वहां नेपाल को भारत की विदेश नीति के साथ बहुत कोऑर्डिनेट करके चलना पड़ेगा।’

एक्सपर्ट ने आगे कहा, ‘दूसरा, अगर नेपाल की इकोनॉमी के हिसाब से सोचें, तो उनका जो हाइड्रो पावर सेक्टर है, चाहे उसके डेवलपमेंट की बात हो या हाइड्रो पावर के लिए मार्केट खोजने की बात हो, दोनों ही मामलों में उनको भारत की भूमिका लेनी पड़ेगी। इसलिए मुझे लगता है कि जब एक एस्पिरेशनल नेशन किसी यूथ लीडर के साथ आगे बढ़ेगा, तो वह अपनी इकोनॉमी को इग्नोर नहीं कर पाएगा। और जब बात इकोनॉमी की आती है, तो नेपाल को भारत के साथ चलना ही पड़ेगा।’





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