
मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग और अन्य मौजूदा व पूर्व कंपनी अधिकारियों के खिलाफ दायर 8 अरब अमेरिकी डॉलर के मुकदमे का ट्रायल गुरुवार को शुरू हो गया। यह केस मेटा प्लेटफॉर्म्स के शेयरधारकों ने किया है। ctvnews की खबर के मुताबिक, आरोप है कि मेटा (पूर्व में फेसबुक) ने साल 2012 में अमेरिकी फेडरल ट्रेड कमीशन (एफटीसी) के साथ हुए समझौते का उल्लंघन करते हुए फेसबुक यूजर्स का डेटा गैरकानूनी रूप से स्टोर किया है। ऐसे में आने वाले दिनों में जुकरबर्ग के लिए चुनौतीपूर्ण परिस्थितियां खड़ी हो सकती हैं।
नील रिचर्ड्स की गवाही से ट्रायल की शुरुआत
खबर के मुताबिक, ट्रायल की शुरुआत वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी लॉ स्कूल के प्राइवेसी एक्सपर्ट नील रिचर्ड्स की गवाही से हुई, जिन्होंने कोर्ट में कहा कि फेसबुक की प्राइवेसी पॉलिसीज़ भ्रामक थीं।
इस गैर-जूरी ट्रायल की सुनवाई डेलावेयर चांसरी कोर्ट की चीफ जज कैथलीन मैककॉर्मिक कर रही हैं। ये वही जज हैं जिन्होंने पिछले साल एलन मस्क का 56 अरब डॉलर का टेस्ला पे पैकेज कैंसिल कर दिया था।
इस मुकदमे में मार्क जुकरबर्ग के अलावा शेरिल सैंडबर्ग, मेटा की पूर्व COO मार्क आंद्रेसेन, वेंचर कैपिटलिस्ट और बोर्ड मेंबर पीटर थील, पालेंटियर टेक्नोलॉजीज के को-फाउंडर रीड हेस्टिंग्स, नेटफ्लिक्स को-फाउंडर व्हाइट हाउस के चीफ ऑफ स्टाफ जेफ्री जायंट्स के नाम भी शामिल हैं।
कैसे शुरू हुआ ये मामला?
मेटा प्राइवेसी से जुड़ा यह मामला 2018 में तब शुरू हुआ, जब खुलासा हुआ कि कैम्ब्रिज एनालिटिका नाम की राजनीतिक कंसल्टिंग फर्म ने करोड़ों फेसबुक यूज़र्स का डेटा एक्सेस किया था। यह फर्म 2016 में डोनाल्ड ट्रंप की राष्ट्रपति चुनावी मुहिम के लिए काम कर रही थी। एफटीसी ने इस डेटा लीक के बाद फेसबुक पर 5 अरब डॉलर का जुर्माना लगाया था, आरोप था कि कंपनी ने 2012 के समझौते का उल्लंघन किया। अब मेटा के शेयरधारक यह चाहते हैं कि एफटीसी का जुर्माना और दूसरे कानूनी खर्च- कुल मिलाकर 8 अरब डॉलर कंपनी के दोषी अधिकारियों से वसूले जाएं।
हालांकि, मेटा या जुकरबर्ग ने अब तक कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की है। कोर्ट फाइलिंग्स में प्रतिवादियों ने आरोपों को अत्यधिक बताया है। साथ ही कहा है कि फेसबुक ने एफटीसी के साथ हुए समझौते के पालन के लिए बाहरी कंसल्टिंग फर्म को नियुक्त किया था। असल में फेसबुक कैम्ब्रिज एनालिटिका की धोखाधड़ी का शिकार हुआ।
केस की कितनी है अहमियत
यह मुकदमा केयरमार्क दावा की कैटेगरी में आता है- यानी बोर्ड सदस्यों पर आरोप है कि उन्होंने कंपनी पर पर्याप्त निगरानी नहीं रखी। डेलावेयर कॉर्पोरेट कानून में ऐसे केस सबसे मुश्किल माने जाते हैं, लेकिन हाल के वर्षों में कोर्ट ऐसे मामलों को सुनवाई के लिए स्वीकार कर रही है। मेटा ट्रायल ऐसे समय में शुरू हुआ है जब डेलावेयर में कॉर्पोरेट कानून में बदलाव किए गए हैं ताकि जुकरबर्ग जैसे नियंत्रण रखने वाले शेयरधारकों के खिलाफ मुकदमा चलाना और मुश्किल हो सके।
