
Donald Trump And UNGA
UN General Assembly Multipolar World: दुनिया का राजनीतिक तंत्र आज के समय में बेहद जटिल नजर आ रहा है। स्थितियां तेजी से बदल रही हैं और इसे दुनिया के लिहाज से संक्रमण काल कहा जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा का सत्र चल रहा है और इस दौरान बदलाव की तस्वीर बड़े स्पष्ट तौर पर सामने आई है। कई देशों के वक्तव्यों से यह संदेश गया है कि अब एकाधिकार या वर्चस्व की परंपरागत शक्ति संरचनाएं कमजोर हो रही हैं और नए शक्ति केंद्र, नए गठबंधन, नए दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं। इसे ऐसे भी देखा जा सकता है कि अमेरिका का दुनिया भर में दबदबा अब अंतिम सांसे गिन रहा है। वैसे राष्ट्रपति ट्रंप के ‘Make America Great Again’ बयान से ही इस बात को बल जाता है कि अमेरिका अब एक शक्ति नहीं रहा है। अमेरिका अपने शिखर पर पहुंच चुका है और अब वह ढलान पर है।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने क्या कहा?
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने महासभा की शुरुआत में जो कहा उसका बड़ा महत्व है। उन्होंने कहा कि “विश्व तेजी से बहुध्रुवीय हो रहा है” और यह कि “Multipolarity Without Effective Multilateral Institutions Courts Chaos” अर्थात यदि बहुध्रुवीयता हो, लेकिन उसे वश में लाने वाली विश्वव्यापी संस्थाएं मजबूत ना हों, तो अराजकता का खतरा मौजूद रहेगा। साफ है कि उन्हें चिंता है कि नई शक्ति संरचनाएं अस्तित्व में तो आ रही हैं, लेकिन उन्हें नियंत्रित, न्यायसंगत और समावेशी बनाने की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है।
कई देशों ने पकड़ी अलग राह
वैसे देखा जाए तो विश्व के कई नेताओं ने नई व्यवस्था वाली दुनिया की झलक के संकेत दिए हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने महासभा में फलस्तीन को एक राज्य के रूप में मान्यता दी है। इससे पहले ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया ने भी फलस्तीन को मान्यता दी है। इसके अलावा कई अन्य देश भी ऐसा कर सकते हैं। यह घटना सामान्य नहीं है यह संकेत है कि पश्चिमी देश जो कभी इजरायल के समर्थन में खड़े रहते थे अब अलग राह पकड़ रहे हैं।
बहुध्रुवीय विश्व का क्या है मतलब?
बहुध्रुवीय व्यवस्था का मूल यह है कि शक्ति अब किसी एक ध्रुव या देश के हाथों नहीं सिमटी रहे, बल्कि अनेक केंद्र विकसित हों। जैसे कि चीन, रूस, भारत, यूरोपीय संघ, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देश। इन विभिन्न केंद्रों के बीच शक्ति का विकेंद्रीकरण तो हो लेकिन संतुलन बने रहना सबसे अधिक जरूरी है। खोजने की प्रक्रिया चल रही है।

UNGA
कई देशों ने दबाव को किया दरकिनार
देखने वाली बात यह भी है कि बहुत से ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील) देशों ने युद्ध, सुरक्षा और मानवाधिकारों से जुड़े प्रस्तावों पर पश्चिमी ध्रुव की लाइन से अलग वोट किया है। यह दर्शाता है कि वो अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा करने के लिए आगे आ रहे है। साफ है कि ऐसा तभी संभव है जब हर तरह के दबाव को दरकिनार कर दिया जाए।
मतबूत बनें संस्थाएं
बहुध्रुवीय व्यवस्था तभी स्थिर बन सकती है जब विश्वस्तर की संस्थाएं मतबूत बनें। यूएन, WTO, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय सक्षम हों, निष्पक्ष हों और विश्व समुदाय को विश्वास दिला सकें कि हर तरह की समस्या का समाधान एक दायरे में संभव है। यदि ये संस्थाएं कमजोर पड़ीं, तो शक्तिशाली देशों का वर्चस्व फिर कायम हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस ही डर का संकेत दिया है।
करना होगा अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का पालन
नई व्यवस्था में, क्षेत्रीय समूहों और गठबंधनों की भूमिका का महत्त्व और अधिक बढ़ जाएगा। उदाहरण के लिए, अफ्रीका संघ, एशियाई देश समूह, लैटिन अमेरिकी ब्लॉक्स, दक्षिण एशियाई और दक्षिण पूर्व एशियाई देश। नई व्यवस्था में केवल शक्ति और सुरक्षा ही नहीं, बल्कि न्याय, विकास और अंतर्राष्ट्रीय कानून का पालन भी जरूरी होगा। देश यह ना मानें कि अंतरराष्ट्रीय नियम और कानून से बड़े देश ऊपर हैं। जलवायु न्याय, विकास सहायता, आतंकवाद-रोधी नीतियां, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे विषय नए विश्व के केंद्र में होने चाहिए।
नए युग में प्रवेश कर रही है दुनिया?
वैसे देखा जाए तो संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस सत्र ने यह स्पष्ट कर दिया कि दुनिया एक नए युग में प्रवेश कर रही है। एक ऐसा युग जिसमें शक्ति अब केंद्रीकृत नहीं, बल्कि विभाजित, अधिक साझा और परिणाम देने वाली नजर आ रही है। बहुध्रुवीय व्यवस्था की दिशा में यह कदम ना केवल वैश्विक संतुलन की पुनर्स्थापना का संकेत है, बल्कि यह बड़ी ताकतों को चुनौती देने का भी अवसर है। राष्ट्र नए गठबंधन बना रहे हैं और पुरानी ताकतों की खुलेआम अवहेलना हो रही है। आने वाले दिनों में तस्वीर और साफ होगी क्या यह सिर्फ कूटनीति के खेल हैं या सच में एक नई वैश्विक व्यवस्था की शुरुआत हो रही है।
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