जिस अमेरिकी टैरिफ से डर रही थी दुनिया, उसका असर क्यों पड़ा फीका? ट्रंप की स्ट्रेटेजी पर बड़ा सवाल


ट्रंप के टैरिफ से नहीं...- India TV Paisa

Photo:FREEPIK ट्रंप के टैरिफ से नहीं हिला ग्लोबल मार्केट!

जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया भर के देशों से आने वाले आयात पर रिकॉर्ड स्तर के टैरिफ लगाने का ऐलान किया था, तब आशंका जताई जा रही थी कि दुनियाभर का व्यापार हिल जाएगा, महंगाई बेकाबू होगी और अमेरिकी बाजार में उथल-पुथल मच जाएगी। लेकिन हकीकत इससे काफी अलग नजर आई। टैरिफ बढ़ने के बावजूद उसका असर उतना तीखा नहीं पड़ा, जितना शुरुआती अनुमानों में बताया जा रहा था। अब हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के अर्थशास्त्रियों की एक नई रिसर्च ने इसके पीछे की असली वजह सामने रखी है।

रिसर्च के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने जिन ऊंचे टैरिफ रेट्स का ऐलान किया था, वास्तव में कंपनियों ने उतना टैक्स चुकाया ही नहीं। सितंबर के अंत तक अमेरिका में आयात पर वास्तविक टैरिफ दर औसतन 14.1% रही, जबकि आधिकारिक तौर पर घोषित दर करीब 27% से ज्यादा थी। यानी कागजों पर टैरिफ ऊंचा दिखा, लेकिन जमीन पर उसकी धार काफी कुंद रही।

क्या वजह रही?

इसकी सबसे बड़ी वजह रही कई स्तरों पर दी गई छूट। जब टैरिफ का ऐलान हुआ, उस समय समुद्र में जहाजों पर लदे माल को राहत दे दी गई। चूंकि अमेरिका तक माल पहुंचने में हफ्तों लगते हैं, इसलिए कंपनियों पर टैरिफ का असर धीरे-धीरे पड़ा। इसके अलावा सेमीकंडक्टर और उनसे जुड़े कई उत्पादों को भी छूट दी गई, जिसे टेक इंडस्ट्री को राहत देने वाला कदम माना गया।

किसे मिला ज्यादा फायदा

कनाडा और मैक्सिको को भी बड़ा फायदा मिला। यूएस-मेक्सिको-कनाडा एग्रीमेंट (USMCA) के तहत उत्तरी अमेरिका में बने कई उत्पादों पर शून्य टैरिफ लागू रहा। 2025 में कनाडा और मैक्सिको से आने वाले करीब 90% सामान को इस समझौते के अनुरूप घोषित किया गया, जिससे टैरिफ बोझ काफी कम हो गया।

टैरिफ से बचने की चालें

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कुछ कंपनियों ने नियमों से बचने के रास्ते भी निकाले। कस्टम फॉर्म में उत्पाद की कीमत, स्रोत या सामग्री को लेकर हेरफेर कर कम टैरिफ चुकाने की कोशिशें की गईं। हालांकि यह गैरकानूनी है, लेकिन इससे भी वास्तविक टैरिफ दर नीचे आई। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि टैरिफ का बोझ किसी पर पड़ा ही नहीं। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ट्रंप के दावों के उलट, टैरिफ का सबसे ज्यादा भार अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं ने उठाया। अध्ययन के अनुसार 2025 में करीब 94% टैरिफ लागत सीधे अमेरिकी आयातकों पर पड़ी, जो आगे चलकर कीमतों में बढ़ोतरी का कारण बनी।

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