पाकिस्तान बना यूएनएससी का अध्यक्ष
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पाकिस्तान बना यूएनएससी का अध्यक्ष

आतंकियों का पनाहगार और दुनिया के हर मंच पर कश्मीर का राग अलापने वाला पाकिस्तान एक जुलाई से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष बनाया गया है और एक महीने तक अध्यक्ष के तौर पर काम करेगा। UNSC का पूरा नाम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद है और यह संयुक्त राष्ट्र के छह प्रमुख अंगों में से एक है और काफी खास है। इसलिए खास है क्योंकि ये मुख्य रूप से अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है और उसमें अपनी बड़ी भूमिका निभाता है। तो ऐसे में इस बड़े परिषद के अध्यक्ष का पद संभालना कई मायनों में खास होता है। यूएनएससी की अध्यक्षता संभालने के दौरान पाकिस्तान के पास कौन सी पॉवर्स आ जाएंगी, ये जानना जरूरी है। 

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पाकिस्तान बना यूएनएससी का अध्यक्ष

सबसे पहले बता दें कि पाकिस्तान इसी साल जनवरी में दो साल के लिए अस्थायी सदस्य चुना गया था, जिसे वोटिंग के दौरान 193 में से 182 वोट मिले थे। अब नए नवेले सदस्य बने पाकिस्तान को एक जुलाई से 31 जुलाई तक अध्यक्ष पद की भूमिका निभानी है और अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने के बाद उसके पास कई पॉवर्स होंगे। जैसे पाकिस्तान सुरक्षा परिषद की सभी औपचारिक और अनौपचारिक बैठकों की अध्यक्षता करेगा। परिषद के एजेंडे को तय करने और प्राथमिकताओं को तय करने में खास भूमिका निभाएगा।

अध्यक्ष परिषद की ओर से प्रेस स्टेटमेंट और सार्वजनिक घोषणाएं जारी करेगा और परिषद के सदस्यों के बीच संवाद और समन्वय तय करेगा, जिससे परिषद की कार्यवाही सुचारू रूप से चले। इसके साथ ही अगर अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को तत्काल खतरा हो, तो अध्यक्ष देश आपातकालीन बैठक बुला सकता है। इसके साथ ही अध्यक्ष देश को परिषद की बैठकों की कार्यवाही को कंट्रोल करने, वक्ताओं को बुलाने और चर्चा को दिशा देने की शक्ति होती है।

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इसमें अल्फाबेटिकल ऑर्डर के तहत अध्यक्षता तय होती है, ताकि सभी सदस्य देशों को बारी-बारी से यूएनएससी की अध्यक्षता करने का मौका मिले। परिषद का अध्यक्ष हर महीने अल्फाबेट के हिसाब से बदलता है, जैसे अभी पाकिस्तान का पी है तो अगला देश क्यू आर एस होगा। ऐसा इसलिए किया जाता है कि जिससे सभी सदस्य देशों को नेतृत्व का मौका मिलता है। यहां यह जानना जरूरी है कि पाकिस्तान साल 1952-53, 1968-69, 1976-77, 1983-84, 1993-94, 2003-04 और 2012-13 में भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष रह चुका है।

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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को हुई थी और इसका मुख्यालय अमेरिका के न्यूयॉर्क में है। इसमें कुल 15 सदस्य होते हैं, जिसमें  पांच स्थायी सदस्य होते हैं। चीन, फ्रांस, रूस, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका यूएनएससी के स्थायी सदस्य हैं और इन पांचों देश के पास वीटो पावर होती है, जिससे वे किसी भी प्रस्ताव को रोक सकते हैं। इसके अलावा यूएनएससी के 10 अस्थायी सदस्य होते हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा दो वर्षों के लिए चुना जाता है और ये सदस्य क्षेत्रीय आधार पर चुने जाते हैं, जैसे -अफ्रीका और एशिया से पांच, पूर्वी यूरोप से एक, लैटिन अमेरिका और कैरेबियन से दो, पश्चिमी यूरोप और अन्य क्षेत्रों से दो सदस्य चुने जाते हैं।

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पाकिस्तान को यूएनएससी की अध्यक्षता मिलने का कारण उसका अस्थायी सदस्य होना और रोटेशनल क्रम में उसका नंबर आना है, न कि किसी विशेष चुनाव या कूटनीतिक प्रयास के कारण। इस प्रक्रिया में किसी देश की नीतिगत स्थिति या छवि की भूमिका नहीं होती, बल्कि यह पूरी तरह से एक स्वचालित रोटेशन है। अगस्त 2025 में अगला सदस्य, जिसका नाम इंग्लिश अल्फाबेट में “P” के बाद आता है, ये आर होगा, तो इस तरह से यूएनएससी  के सदस्य देशों की वर्तमान सूची के अनुसार, रूस अगला अध्यक्ष हो सकता है।

क्या भारत को चिंता करने की जरूरत है?

पाकिस्तान के यूएनएसी के अध्यक्ष बनने से भारत को तकनीकी रूप से किसी तरह की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि अध्यक्ष देश कोई फैसला अकेले नहीं ले सकता। मगर हां, राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से वो कई गड़बड़ियां कर सकता है। जिसका उदाहरण सामने आ भी चुका है क्योंकि यूएनएससी में पाकिस्तान के राजदूत असीम इफ्तिखार अहमद ने कश्मीर मामले पर चर्चा भी शुरू कर दी, जबकि सबको पता है कि ये भारत और पाकिस्तान के बीच का मसला है। पाकिस्तान के पास एजेंडा कंट्रोल करने की पावर है। वो तय कर सकता है कि किस मुद्दे पर ज्यादा चर्चा हो और किसपर नहीं।  

ये भी हो सकता है कि अध्यक्ष बनने के बाद पाकिस्तान चाहे तो खुद को पीड़ित बता सकता है। इसके साथ ही वह सिंधु जल संधि पर भी अपना दुखड़ा रो सकता है कि भारत ने पानी बंद कर दिया है और जैसा कि ये दुनिया का बड़ा मंच है और उसे मौका मिला है तो वो अपना दुखड़ा पूरी दुनिया को पूरी ताकत से सुना सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि वो ऑपरेशन सिंदूर को लेकर भी उल्टे सीधे बयान दे लेकिन इससे भारत को कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। 





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