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प्यासा का एक सीन।

बॉलीवुड में आम तौर पर हर फिल्म का टाइटल अलग होता है, लेकिन इसके बावजूद कई बार एक ही नाम की फिल्मों का ट्रेंड देखने को मिला है। यह रिवाज काफी पुराना है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मों के नाम इतने यादगार हैं कि नए प्रोड्यूसर्स वही नाम इस्तेमाल कर देते हैं। कभी-कभी ये फिल्में बॉक्स ऑफिस हिट साबित होती हैं तो कभी फ्लॉप। एक खास उदाहरण में 45 साल के अंतराल में एक ही नाम से दो फिल्में रिलीज हुईं। पहली फिल्म ने हिंदी सिनेमा में अपनी जगह मास्टरपीस के रूप में बना ली, जबकि दूसरी उसी नाम वाली फिल्म दर्शकों को पसंद नहीं आई और सुपरफ्लॉप रही। ऐसे टाइटल्स और उनके परिणाम हमेशा फैंस और सिनेमा जगत के लिए दिलचस्प बने रहते हैं। आइए जानते हैं इन फिल्मों से जुड़े रोचक तथ्य।

1957 की प्यासा

1957 में आई फिल्म प्यासा भारतीय सिनेमा की उन कालजयी फिल्मों में से एक है, जिसे देखते ही गुरुदत्त साहब की यादें ताजा हो जाती हैं। फिल्म में वहीदा रहमान, माला सिन्हा, महमूद और जॉनी वॉकर ने शानदार अभिनय किया। गुरुदत्त ने कहानी, निर्देशन और प्रोडक्शन, तीनों जिम्मेदारियां खुद संभाली थीं। एसडी बर्मन के संगीत और साहिर लुधियानवी के गीतों ने फिल्म को अमर बना दिया। खास बात यह है कि प्यासा का सदाबहार गाना सर जो तेरा चकराए… आरडी बर्मन की रचना थी। प्यासा की कहानी गुरुदत्त के मन में 1947-48 के आसपास जन्मी थी। उनकी बहन के अनुसार यह कहानी उनके पिता के जीवन से प्रेरित थी, जो लेखक बनने का सपना छोड़ चुके थे। शुरुआती कहानी का नाम कशमकश था। बाद में गुरुदत्त ने राइटर अबरार अल्वी से मुलाकात की, जिन्होंने रेड लाइट एरिया की पृष्ठभूमि से जुड़ी कहानी सुझाई। इसी से फिल्म में गुलाबो का किरदार जन्मा।

गुरुदत्त ने फिल्म को दिलीप कुमार, नगरीस और मधुबाला के साथ बनाने की सोची थी। मुहूर्त के दौरान दिलीप कुमार का इंतजार करते-करते गुरुदत्त खुद ही मुख्य भूमिका निभाने का निर्णय ले बैठे। दिलचस्प बात यह है कि फिल्म की कहानी का एक हिस्सा साहिर लुधियानवी और अमृत प्रीतम के अधूरे प्रेम संबंधों पर आधारित था। शुरुआती समय में फिल्म दर्शकों को पूरी तरह समझ नहीं आई थी, लेकिन धीरे-धीरे इसे खूब सराहा गया। वाणिज्यिक दृष्टि से भी प्यासा सफल रही। नेट कलेक्शन लगभग 1 करोड़ था और नया दौर और मदर इंडिया के बाद यह साल की तीसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी। फिल्म की सफलता केवल बॉक्स ऑफिस तक सीमित नहीं रही, बल्कि भारतीय सिनेमा के लिए यह एक प्रेरणा बन गई। आज भी फिल्ममेकर और सिनेप्रेमी इसे आदर्श मानते हैं।

2002 की प्यासा

45 साल बाद, 2002 में उसी नाम से एक और प्यासा बनाई गई। इस फिल्म में आफताब शिवदसानी, पूर्व मिस वर्ल्ड युक्ता मुखी और जुल्फी सैयद मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म के निर्देशक ए. मुथू थे और प्रोड्यूसर रमेश शर्मा। स्टोरी, स्क्रीनप्ले और डायलॉग संजीव दुग्गल और जलेस शेरवानी ने लिखे। जुल्फी सैयद का रोल पहले संजय सूरी को ऑफर किया गया था, लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया। युक्ता मुखी को शूटिंग के दौरान कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। प्रोड्यूसर ने उनके पेमेंट में देरी की और हीरो-हीरोइन के बीच कोई केमिस्ट्री नहीं बन पाई। इन समस्याओं के चलते फिल्म की शूटिंग और रिलीज़ दोनों में देरी हुई।

11 अक्टूबर 2002 को जब यह फिल्म रिलीज हुई, तो बॉक्स ऑफिस पर यह पूरी तरह असफल साबित हुई। 2.25 करोड़ के बजट में बनी फिल्म ने सिर्फ 66 लाख की कमाई की। यह फिल्म रोमांटिक ड्रामा थी, लेकिन कहानी और अभिनय के बीच तालमेल न होने की वजह से दर्शकों का दिल जीतने में नाकाम रही। इसके बाद युक्ता मुखी का करियर भी धीरे-धीरे गायब हो गया। उनकी पर्सनल लाइफ भी विवादों में रही। 2008 में उन्होंने उद्योगपति प्रिंस तुली से शादी की, लेकिन 2013 में तलाक हो गया। अब युक्ता मुखी फिल्मों से दूर, गुमनाम जिंदगी बिता रही हैं।

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