
दुनिया की राजनीति में कई बार भाषण नहीं, आंकड़े बोलते हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब भारत के लिए टैरिफ घटाकर 18% करने का ऐलान किया, तो यह खबर नई दिल्ली में संतोष की वजह बनी, लेकिन इस्लामाबाद में जैसे सन्नाटा पसर गया। वजह साफ थी कि पाकिस्तान आज भी 19% टैरिफ के बोझ तले दबा है। महज 1% का फर्क, लेकिन संदेश बहुत बड़ा।
एक नंबर, बड़ा सियासी झटका
यह मामला सिर्फ टैक्स रेट का नहीं था, बल्कि हैसियत का था। पाकिस्तान लंबे समय से यह मानकर चल रहा था कि उसने ट्रंप को खुश करने की कला सीख ली है। कभी नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन, कभी बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होना, तो कभी हर मंच पर तारीफों के पुल। उम्मीद थी कि इसका इनाम मिलेगा। लेकिन जब भारत को तरजीह मिली, तो यह भ्रम एक झटके में टूट गया।
सोशल मीडिया पर छलका गुस्सा
ट्रेड डील की खबर आते ही पाकिस्तानी सोशल मीडिया पर मीम्स, तंज और आत्म-आलोचना की बाढ़ आ गई। यूजर्स ने गिनाना शुरू किया कि आखिर क्या-क्या किया गया था अमेरिका को खुश करने के लिए और बदले में क्या मिला। नाराजगी भारत से ज्यादा अपने सिस्टम और रणनीति पर दिखी।
भारत की खामोश कूटनीति
भारत ने इस पूरे दौर में शोर नहीं मचाया। ट्रंप की पर्सनल डिप्लोमेसी से दूरी बनाए रखी और संस्थागत बातचीत पर जोर दिया। यहां तक कि रिपोर्ट्स में यह भी आया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार ट्रंप के कॉल लेने से इनकार किया। यह बेरुखी नहीं, बल्कि रणनीतिक अनुशासन था और नतीजा सामने है।
पाकिस्तान की सबसे बड़ी भूल
इस पूरे घटनाक्रम ने एक सच्चाई उजागर कर दी कि करीबी दिखना और प्रभावशाली होना दो अलग बातें हैं। पाकिस्तान ने नजदीकी को ताकत समझ लिया, जबकि भारत ने ऑप्शन तैयार किए। अमेरिका के अलावा यूरोपीय यूनियन, ब्रिटेन और कई देशों से ट्रेड डील कर भारत ने दिखा दिया कि वह किसी एक ताकत पर निर्भर नहीं है।
संदेश साफ है
भारत-अमेरिका ट्रेड डील ने पाकिस्तान को यह एहसास दिला दिया कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तारीफें नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक और रणनीतिक वजन काम आता है। 18% बनाम 19% का यह फर्क सिर्फ आंकड़ों में छोटा है, लेकिन कूटनीतिक मायनों में यह एक बड़ा अलार्म है।
