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मुगल बादशाह औरंगजेब

औरंगजेब मुगल वंश का छठा शासक था जिसने 1658 से 1707 तक गद्दी संभाली थी। अपने शासनकाल में औरंगजेब ने कई ऐसे काम किए जिससे उसे भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विरोध का सामना करना पड़ा। औरंगजेब ने कई क्षेत्रों में तो आसानी से कब्जा कर लिया लेकिन उसे सबसे कड़ी टक्कर मिली दक्कन से। आपको बता दें कि औरंगजेब अपने 50 वर्षों के शासनकाल में 1658 ईस्वी से 1681 ईस्वी तक उत्तर भारत में रहा। हालांकि, इसके बाद उसने दक्कन अभियान शुरू किया जो कि उसके लिए खतरनाक साबित हुआ और वह कभी भी वापस उत्तर भारत नहीं आ पाया। आज 8 फरवरी है और जानकारी के अनुसार, इसी तारीख को औरंगजेब ने अपना आखिरी सैन्य अभियान चलाया था। आइए जानते हैं कि औरंगजेब दक्कन में कैसे विफल हो गया।

दक्कन के लिए क्यों निकला था औरंगजेब?

औरंगजेब ने अपना आखिरी सैन्य अभियान दक्कन में चलाया। साल 1681 में वह उत्तर भारत से दक्कन की ओर बढ़ा। उसके इस अभियान का मकसद था बीजापुर और गोलकुंडा पर कब्जा करना और मराठाओं को पूरी तरह से परास्त करना। हालांकि, छत्रपति शिवाजी महाराज ने स्वराज्य के लिए जंग की जो नींव रखी थी वह उनके निधन के बाद भी जारी रही। पहले छत्रपति संभाजी ने औरंगजेब के खिलाफ विद्रोह को जारी रखा। फिर 1689 में उनके निधन के बाद भी ये विद्रोह लगातार जारी रहा। औरंगजेब ने बीजापुर और गोलकुंडा पर तो कब्जा कर लिया लेकिन मराठों से उसका संघर्ष लगातार जारी रहा। वह मराठों को कभी भी पूरी तरह से परास्त नहीं कर पाया।

कैसे विफल हो गया औरंगजेब का अभियान?

1680-81 में औरंगजेब पूरे लाव-लश्कर के साथ दक्कन की ओर बढ़ा। तब ये परंपरा थी राजा के साथ उसकी राजधानी भी साथ चलती थी। औरंगजेब करीब 5 लाख से ज्यादा की सेना, हजारों ऊंट, घोड़े, हाथी और तोपखाने के साथ दक्कन की ओर बढ़ा। हालांकि, इतनी बड़ी सेना के बावजूद भी औरंगजेब मराठों को हराने में नाकामयाब रहा। मराठों ने औरंगजेब की विशाल सेना के खिलाफ छापामार या गुरिल्ला युद्ध को जारी रखा जिससे उसकी सेना को काफी नुकसान उठाना पड़ा। ऐसे में औरंगजेब की सेना को नुकसान होता रहा और वो थकती गई। करीब 27 साल तक औरंगज़ेब दक्कन में ही फंसा रहा। इस सैन्य अभियान में मुगल साम्राज्य का खजाना लगातार खाली होता रहा और ये अभियान औरंगजेब ओर मुगल साम्राज्य के लिए एक घाव की तरह बन गया। एक तरफ मुगल सेना दक्षिण में लगातार युद्ध लड़ रही थी, तो वहीं दूसरी ओर उत्तर भारत में जाटों, सिखों और राजपूतों द्वारा विद्रोह शुरू हो गए।

कभी दिल्ली वापस नहीं आ सका औरंगजेब

औरंगजेब का दक्कन को जीतने का जुनून धीरे धीरे एक बड़ी गलती में बदल गया। उसके इस अभियान के कारण मुगल साम्राज्य संसाधनों की कमी से जूझने लगा, खजाना खाली होने लगा, सैनिकों का मनोबल गिर गया, और लंबे समय तक जारी युद्ध ने प्रशासन पर काफी ज्यादा दबाव बढ़ा दिया था। मराठों की गुरिल्ला रणनीति, पश्चिमी घाटों का गहरा ज्ञान और असफलताओं के बाद तेजी से पुनर्गठित होने की क्षमता ने धीरे धीरे औरंगजेब की सेना को बुरी तरह थका दिया। आखिकार औरंगजेब को समझ आ गया कि वह एक अंतहीन युद्ध के जाल में फंस गया है। करीब 27 साल तक चले इस अभियान में मुगल सेना और साम्राज्य दोनों ही कमजोर होते चले गए। औरंगजेब ने आखिरी सैन्य अभियान 1705 में वागिंगेरा की घेराबंदी में चलाया , जिसमें उसने मराठों के सहयोगी बेराड नायकों को काबू में करने की कोशिश की थी।

1680-81 में दक्कन के अभियान पर निकले औरंगजेब ने साल 1706 में औरंगाबाद की ओर पीछे हटना शुरू किया। इस दौरान भी मराठों ने रास्ते में हमले जारी रखे। हालांकि, औरंगजेब आखिरकार कभी उत्तर भारत वापस नहीं आ सका। 88 साल की उम्र में, 3 मार्च 1707 को अहमदनगर में औरंगजेब उसका निधन हो गया। इसके बाद उसे औरंगाबाद जिले के खुलदाबाद में दफनाया गया। औरंगजेब की मौत के साथ ही मुगल साम्राज्य का पतन शुरू हो गया ओर धीरे धीरे मुगलों की ताकत खत्म होती चली गई।

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