बांग्लादेश चुनाव में वोट देने के लिए कतार में लगीं महिलाएं।- India TV Hindi
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बांग्लादेश चुनाव में वोट देने के लिए कतार में लगीं महिलाएं।

Explainer: बांग्लादेश में आज बृहस्पतिवार सुबह से 13वें संसदीय चुनाव के लिए वोटिंग शुरू हो चुकी है। साल 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से बेदखल होने के बाद यह बांग्लादेश का पहला आम चुनाव है। इस चुनाव में शेख हसीना की आवामी लीग पार्टी को बैन कर दिया गया है। लिहाजा वह चुनाव में हिस्सा नहीं ले रही है। शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से ही भारत-बांग्लादेश के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण चल रहे हैं। बांग्लादेश में कट्टर इस्लामवादी सोच रखने वाली पार्टियां अब पाकिस्तान से दोस्ती बढ़ा रही हैं। यह भारतीय कूटनीति के लिहाज से कतई अच्छा नहीं है। आवामी लीग पार्टी की सरकार गिरने के बाद अब किसी भी दूसरी राजनीतिक पार्टी से मजबूत संबंध बनाना भारत के लिए आसान नहीं लग रहा। वजह ये है कि ज्यादातर राजनीतिक गठबंधन कट्टर इस्लामवादी सोच वाले हैं, जिसकी वजह से बांग्लादेश में लगातार हिंदुओं की हत्याएं और उन पर जुर्म हो रहे हैं। बांग्लादेश भारत का पड़ोसी है और 4 हजार किलोमीटर से ज्यादा सीमा साझा करता है, लिहाजा ढाका चुनाव भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

भारत के लिए क्यों सबसे अहम है ये चुनाव? 

बांग्लादेश भारत का निकटम पड़ोसी है, जो नई दिल्ली के साथ 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है। यह भारत की सबसे लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। ऐसे में बांग्लादेश का यह चुनाव भारत की सुरक्षा, व्यापार, सीमा प्रबंधन, अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता को सीधे प्रभावित करने वाला साबित होगा। साल 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले विद्रोह के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की अवामी लीग सरकार गिर गई, जो भारत की करीबी सहयोगी थी। हसीना के भारत में शरण लेने से द्विपक्षीय संबंधों में ऐतिहासिक गिरावट आई है। हाल के बजट में इसके चलते भारत ने बांग्लादेश को दी जाने वाली आर्थिक सहायता को आधा कर दिया है। 

बांग्लादेश चुनाव का पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों पर भी पड़ेगा असर

बांग्लादेश में हो रहे चुनाव के नतीजे भारत के पूर्वी राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल और असम में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनावों पर भी असर डालेंगे। क्योंकि इन राज्यों में बांग्लादेशी प्रवास, नागरिकता और सांप्रदायिक राजनीति बड़े मुद्दे हैं। भाजपा बांग्लादेश को ‘घुसपैठ’ का प्रतीक बनाकर वोट बटोरती है, जबकि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पार्टी (टीएमसी) इसे क्षेत्रीय पहचान से जोड़ती है।


चुनाव में मजबूत हुईं कट्टरपंथी ताकतें तो भारत के लिए बढ़ेगी चुनौती

अगर इस चुनाव में बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतें मजबूत होती हैं तो यह भारत के लिए कड़ी चुनौती पेश करेंगी। क्योंकि इसके बाद भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में और अधिक कड़वाहट बढ़ने के साथ ही साथ भारत-पाकिस्तान-चीन की क्षेत्रीय गतिशीलता भी बदल सकती है। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद मौजूदा मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने पाकिस्तान और चीन से करीबी बढ़ाकर इसका संकेत भी दिया है। ऐसे में भारतीय कूटनीति के लिए बांग्लादेश का यह चुनाव कड़ी परीक्षा साबित होने जा रहा है। 

कौन पार्टी आ सकती है सत्ता में?

पहली बार ऐसा हो रहा है, जब पिछले 15 साल तक लगातार सत्ता में रही पूर्व प्रधानमंत्री की अवामी लीग पार्टी को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया है। यह चुनाव अब आवामी लीग के बगैर हो रहा है। ऐसे में मुख्य मुकाबला पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की  बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11-पार्टी गठबंधनों के बीच है। बीएनपी की कमाल दिवंगत खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान संभाल रहे हैं। वह 17 साल के निर्वासन के बाद बांग्लादेश लौटे हैं और देश में प्रमुख सुधारों का वादा कर रहे हैं। ओपिनियन पोल्स में बीएनपी को बढ़त दिख रही है। कई सर्वे में बीएनपी को 44.1% वोट शेयर, जबकि जमात गठबंधन को 43.9% वोट शेयर मिलते दिखाया गया है। 

क्या है  जमात-ए-इस्लामी?

बांग्लादेश की  जमात-ए-इस्लामी पार्टी मुस्लिम ब्रदरहुड से प्रेरित है। यह पार्टी पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के दमन के बाद दोबारा प्रमुखता से उभरी है। यह कट्टर इस्लामवादी सोच वाले युवाओं तथा रूढ़िवादियों में ज्यादा लोकप्रिय है। ऐसे में इस पार्टी के भी सत्ता में आने की प्रबल संभावनाएं हैं। बांग्लादेश में कुल 299 सीटों के लिए वोटिंग हो रही है। देश के 12.77 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं। बांग्लादेश में चौथी बार 84-पॉइंट सुधार जनमत संग्रह भी वोटिंग के साथ चल रहा है। 


किसके आने से दिल्ली को नुकसान? 

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार अगर पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की बीएनपी सत्ता में आती है तो भी यह भारत के लिए ठीक होगा, लेकिन गलती से भी अगर जमात-ए-इस्लामी की जीत हो गई तो यह सबसे खतरनाक साबित हो सकता है। जमात-ए-इस्लामी कट्टर इस्लामवादी सोच वाली पार्टी है, जिसका लगाव पाकिस्तान से है। वह भारत के खिलाफ जहर उगलने वाली पार्टी है। जबकि बीएनपी से भारत ने पिछले कुछ महीनों में रिश्ते सुधारने का प्रयास किया है। पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की तबीयत खराब होने के दौरान और उसके बाद उनका निधन हो जाने के बाद पीएम मोदी ने गहरी शोक संवेदना जाहिर की थी।

यह बीएनपी के साथ रिश्ते सुधारने की दिशा में एक बड़ा संकेत माना गया था। जमात-ए-इस्लामी पूरी तरह भारत-विरोधी पार्टी है। अगर यह पार्टी सत्ता में आई तो हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले और अधिक तेज हो सकते हैं। इसके साथ ही यह सीमा सुरक्षा को कमजोर कर सकता है। जमात-ए-इस्लामी चीन-पाकिस्तान से करीबी बढ़ा रहा है।  जबकि बीएनपी के साथ भारत अपने रिश्तों को री-सेट कर सकता है, क्योंकि मोदी सरकार ने तारिक रहमान से संपर्क बढ़ाया है। ऐसे में बांग्लादेश का यह चुनाव भारत की विदेश नीति के लिए सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट है, जहां स्थिर, धर्मनिरपेक्ष सरकार ही दिल्ली के हितों की रक्षा करेगी।





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